Thursday, October 28, 2010

ग़ौरतलबः करवा चौथ, धर्म की परिभाषा, तीन कोण

हाल ही में फेसबुक पर मैंने एक छोटी-सी बात रखी थी,

बेटे के लिए जितिया, पति के लिए करवा चौथ और तीज...खुद के लिए?
 
मैंने ऐसा लिखा  था महज इसलिए क्यों कि मैंने बचपन से ही परिवार से लेकर मुहल्ले और कस्बे-शहर की तमाम औरतों को पतियों पर हुक्म चलाने वाली स्थिति में होते हुए भी उपवास करते देखा था। बेटे की लाख कुटाई के लिए मशहूर मां भी जितिया करना न भूलती थी। इन तमाम औरतों को मैंने कभी खुद के लिए व्रत या उपवास करते नहीं देखा था। लेकिन मुझे इस बयान पर तमाम तरह के कमेंट मिले।

इन टिप्पणियों में कुछ तो नारीवादी विमर्श के थे. कुछ विरोध में थे, कुछ यों ही लफ्फाजी थी।

लेकिन समाजसेवा कर रही रोम्पी झा और वरिष्ठ पत्रकार पारिजात कौल के की टिप्पणियां बहस को नई दिशा देती दिखीं।

उनकी टिप्पणियों को अविकल प्रस्तुत कर रहा हूं ताकि बहस  को नए कोण मिल सकें। मैं इस आग में बस घी डालने वाले अग्निहोत्र की भूमिका में हूं।

मंजीतः बेटे के लिए जितिया, पति के लिए करवा चौथ,तीज...खुद के लिए?

प्रवीण मोहताः है ना, ताने गालियां और त्याग। ये सब औरत के हिस्से में ही आता है. मर्द के हिस्से में जब ये सब चीज़ें आती हैं तो बेचारा फांसी लगा लेता है.

रोम्पी झाः
बात पुरानी है ! राजा-महाराजाओं का जमाना था ! एक बलोच (ऊंट पालने वाले को बलोच कहते हैं) की एक ऊंटनी गुम हो गई ! काफी खोज-बीन के बाद उस ऊंटनी का सुराग लगा ! ऊंटनी एक सेठ के घर बन्धी थी ! बलोच ने सेठ से ऊंटनी वापिस करने को कहा ! सेठ ने सा...फ ...इंकार कर दिया ! वह उसे अपनी ऊंटनी बताता था !

बात बढ गई ! लडाई – झगडे की नौबत आ पहुंची ! लोगों के समझाने-बुझाने पर दोनो राजा के दरबार में जाने को राजी हो गए ! भरे दरबार में मुकदमा शुरू हुआ ! बलोच कहता था ऊंटनी मेरी है और सेठ कहता था ऊंटनी मेरी है !

राजा ने बलोच से पूछा – “तुम कहते हो कि ऊंटनी तुम्हारी है ! तुम्हारे पास इस बात का कोई सबूत है ?”

बलोच बडे अदब से एक कदम पीछे हट कर, झुक कर बोला – “जनाब, एक सबूत है !”

“क्या ?” – सेठ ने घूरा !

“क्या ?” – राजा ने पूछा !

“महाराज, अगर ऊंटनी को मारकर इसके दिल को चीरकर देखें तो उसमें आपको तीन सुराख मिलेंगे !” बलोच ने उत्तर दिया !

राजा हैरान ! सेठ हैरान ! दरबारी हैरान ! सभी हैरान !

“यह तुम कैसे कह सकते हो कि इसके दिल में तीन सुराख हैं !” राजा ने आश्चर्य से पूछा – “तुम ज्योतिष विद्या जानते हो क्या ?”

“महाराज” – बलोच ने बडे अदब से उत्तर दिया –“जब किसी मां का बेटा भरी जवानी में मर जाता है तो उस मां के दिल में एक सुराख हो जाता है ! जो जिन्दगी भर नहीं भरा जा सकता ! इस ऊंटनी को मैंने बचपन से पाला है ! इसकी आंखों के सामने इसके तीन बेटे एक के बाद एक भगवान को प्यारे हो गए ! इसलिए इसके दिल में तीन सुराख अवश्य मौजूद होंगे ! मां का दिल जो ठहरा !”

दरबार में सन्नाटा-सा छा गया ! सभी हैरानी से एक-दूसरे का मुंह ताकने लगे !

कहने की जरुरत नहीं कि राजा ने सेठ की सफाई सुनने की भी आवश्यकता न समझी ! ऊंटनी बलोच के हवाले करने का हुक्म दे दिया !



विनीत कुमारः घडीघंट नारायण की पूजा। बिना कोई उपवास रखे...


मंजीतः आगे आएं बीवी और मां के लिए सोचने वाले , पहले मां के लिए शुरु करते हैं एक व्रत..है कोई?

विनीत कुमारः मैं मां को लेकर बहुत नार्मल हूं,365 दिन फोन पर बातें करता हूं। वो भी मुझे लेकर बहुत इमोशनल है,व्रत की अलग से जरुरत महसूस नहीं होती। वैसे भी एक नास्तिक बेटे को ऐसा करते देख मेरी मां खुशी नहीं होगी।.

पारिजात कौलः
भैय्या ये बेटे और पति को ज़िंदा रखा किसलिए जाता है ये समझने की ज़रुरत है. गाय को पालते हो तो क्या पुण्य कमाने के लिए? नहीं, उसका दूध चुराने के लिए. दूध चुरा-चरा कर इंडस्ट्री खड़ी कर ली. चाकलेट, बनाया, चीज़ बनाया (यहाँ का पनीर और वहाँ का चीज...़) और भी जाने क्या-क्या.
यहाँ तुम, खुशफ़हमी मे जिए जा रहे हो. और तो और औरतों के ग़म मे उनसे ज्यादा आंसू बहा रहे हो.

धर्म एक नितांत व्यक्तिगत प्रक्रिया है जो व्यक्ति द्वारा केवल अपनी लिए की जा सकती है. राम को भी विलाप करना पडा था, भूल गए क्या. अभी तो राम अयोध्या लौटे भी नहीं हैं.

महात्मा बुद्ध ने कहा, फिर महावीर जैन भी बोले, गुरु नानक भी ज्ञान देने आये कि खुद को सुधारों. हमारे धर्म/ दर्शन में मसीह का विचार नहीं है, जो आये और तुम्हारे पापों का बोझ अपने ऊपर ले कर तुम्हे पाप मुक्त कर दे. ये हिन्दू विचार मे कहीं नहीं है.

धर्म को गली देने से पहले धर्म जानो तो. कहाँ धर्म मे लिखा है कि औरतों को पति, बेटे के लिए उपवास रखना है. कर्म-काण्ड को धर्म मे घुसा कर घड़ी-घड़ी झंडा उठा लेते हो. ये दूसरों के लिए उपवास-शुप्वास रखना औरतों का षड़यंत्र है जो पुरुषों को ख्वामखाह एहसान तले दबाने के लिए किया जाता है. और तुम फेसबुक पर अपनी आत्मग्लानी के नीचे हमें भी दबाने की कोशिश कर रहे हो. जैसे गोरे साहब के काले गुलाम आज भी उन्ही के गुण गाते है.

अब समय है पुरुषों की आज़ादी का. औरतों को साफ़तौर पर कहो कि बंद करें पति-बेटे के लिए उपवास. हम पुरुष अपना जीवन जियेंगे, सक्षम हैं, सशक्त हैं, पुरुष हैं. अरे नियती से क्या डरना, उसे बदल नहीं पायें तो क्या उससे लड़ने मे डरते नहीं. बोलो कह पाओगे अपनी पत्नी को कि अब और उपवास नहीं.

जागो, गुलाम, जागो!

तोड़ो कारा तोड़ो!
 
पुनश्चः इसी दिशा मे थोड़ा और भी. समय-समय पर व्रत-उपवास चिकत्सकीय दृष्टि से लाभदायक होते हैं. परन्तु इन्हें स्वेच्छा से और अपने शरीर की आवश्यकता और सामर्थ्य के अनुसार किया जाये तो.
 
मंजीतः और जिस शुद्ध धर्म की बात आप कर रहे हैं वह कही है क्या..य धर्म पर क्या थोपा गया है इसे कैसे सिद्ध करेगे। आपके हिसाब से हिंदू धर्म है क्या..क्यों कि हिंदुओं के लिए तो कोई फंडामेंटल ही नहीं। एक किताब नहीं, एक देवता नहीं, तो हिंदु धर्म क्या है इसे प्रतिपादित कौन करेगा, कैसे करेगा 
 
पारिजात कौलः
धर्म का तात्पर्य है, 'धारण करने योग्य'. हिन्दू धर्म है लेकिन धर्म का अंग्रेज़ी तर्जुमा रिलिजन नहीं. रिलिजन का आधार ईश्वर नहीं, तथाकथित रूप से ईश्वर द्वारा भेजा गया सन्देश है जो सीधे-सीधे मानव तक नहीं पहुंचा बल्कि किसी ऐसे माध्यम के द्वारा हम...ें बताया गया है जो ईश्वर के निकट होने का दावा करता है. इस दावे के तहत वो माध्यम मानव से उच्चतर कहलाने का भी अधिकार रखता है.

हिन्दू धर्म सनातन है और समय के साथ आने वाले बदलावों को भी समाहित करने में विश्वास रखता है. अब इन बदलावों की प्रक्रिया का किसी समय या कई बार दुरूपयोग हुआ हो इसमें तो मतभेद कम ही होगा. अब इस दुरूपयोग के माध्यम से आयी कुरीतियों को दूर करने की जगह हम पूरे विचार को रिजेक्ट कर दें तो ये विचार की नहीं हमारी समस्या है.

आत्मा और परमात्मा का कोंसेप्ट स्पष्ट है कि आत्मा परमात्मा का ही रूप है, अर्थात दोनों का स्थान बराबर है. आत्मा को परमात्मा तक पहुँचने के लिए किसी माध्यम की आवश्यकता नहीं, न ही परमात्मा के सन्देश को सुनने के लिए मसीह चाहिए.

मसीह के जैसा ही एक विचार यहाँ भी है, अवतार का. लेकिन अवतार मानव रूप मे आता है, जीता है और मर भी जाता है. अवतार एक उदाहरण स्वरुप अपना जीवन जीता है, नश्वर होता है. अवतार मानव जीवन के सभी कार्यकलाप करता है. अंतर सिर्फ इतना है कि आदर्श रूप से सभी कार्यकलाप करेगा अवतार. जैसा पहले भी कहा राम को भी रोना पडा था, घर से बेघर होना पडा था, तीर तलवार से युद्ध करना पडा था. राम के रहते भी लक्ष्मण को मूर्छित होना पडा था.

विष्णु के अवतार राम ने शिव की स्तुति की थी.

देवता एक हो या अनेक अंतर नहीं पड़ता. ईश्वर एक होना मूल है धर्म का. भूलें नहीं देवताओ की कमी नहीं किसी धर्म या रिलिजन मे. एक ढूंढो दस मिलेंगे.

जैसे ईश्वर एक है वैसे ही धर्म भी शुद्ध है, अशुद्धियां आपके और मेरे द्वारा लाई गईं हैं अपनी अपनी समझ और ज़रुरत के चलते.

और जहां तक गुलामी की बात है तो आप इसे गुलामी का एहसास मान के चलें या सत्य का, आप पर है.





 क्या कहते हैं बहस जारी रहे? आप सभी आमंत्रित हैं...धर्म के स्वरुप और राजनीति व कर्मकांड के घालमेल पर विचार दें तो मेरा ज्ञान भी बढे।

Sunday, October 17, 2010

रे रे मेघनाद..बचपन की दुर्गापूजा

...लक्ष्मण ने मेघनाद से गुर्रा कर कहा, रे रे मेघनाद..तुज्झे तो मौत आण परी है...गेरुए कपड़े में लिपटे लक्ष्मण को ऐसे चीखते देख मेघनाद को किसी ने मंच के कोने से एक तीर पकड़ा दिया। बाण के फलक पर एक फुलझड़ी जल रही थी। ...ये ले दुष्ट सौमित्र..कहते हुए फुलझड़ी वाला बाण मेघनाद ने लक्ष्मण की ओर छोड़ दिया। प्रत्यंचा ढीली होते ही, बाण जमीन चाट गया, लेकिन यह मान लिया गया कि शक्ति लक्ष्मण को लग चुकी है। मंच के कोने से एक शर्ट-पैंट पहने आयोजक आकर जलती फुलझडी उठा ले गया। मंच पर वानर के भेष में सजे बच्चों में हाहाकार मचा, अपनी पूंछ की फिक्र करते हनुमान ने लक्ष्मण को उठा लिया ओर यवनिका पतन हुआ।....यह सीन है अभी नवमी की रात को मंचित हो रहे राम लीला का।

जगह- वैशाली, गाजियाबाद

सामने लोगों की भीड़ थी। बगल के पंडाल में माता के जागरण का आयोजन हो रहा था। लेकिन इन्ही दृश्यों के साथ मेरे मन में मूर्तिमान हो उठे, मेरे बचपन के दिन।

मेरा मधुपुर...। मेरा मधुपुर, बंगाल से बहुत सटा है, और कभी बिहार का हिस्सा था आजकल झारखंड का है। लेकिन बिहार का भाग होते हुए भी मधुपुर की तहजीब पर बंगाल का असर ज्यादा था। हमारे यहां दुर्गापूजा की बहुत धूम हुआ करती थी।

षष्ठी से ही समां बंधने लगता था। दुर्गापूजा के लिए हम सभी, मेरे भाई बहन और मेरे मुहल्ले के दोस्त सभी, गुल्लक में पैसे इकट्टे करते थे। साल भर। हालांकि साल भर जमा करने का धैर्य मुझमें था नहीं, लेकिन काफी रोने -पीटने के बाद भैया और मां मुझे इतने तो दे ही देते थे कि मेला घूमने का खर्च निकल ही आता था। वो भी किंग साइज..।

हमारे घर से थोड़ी ही दूरी पर है एडवर्ड जॉर्ज हाई स्कूल । सुना है इसका नाम बदल दिया गया है, क्यों कि यह जॉर्ज पंचम के वक्त में खोला गया था और उन्ही के नाम पर था। बहरहाल, इसका अहाता काफी बड़ा था। तो तरुण समिति नाम की बंगालियों की संस्था चंदा वसूल कर इस पूजा का आयोजन करती थी।

हालांकि, पूजा पूरे मधुपुर में अब भी कई हुआ करते हैं , लेकिन मेले की जो धूम तरुण समिति वाले पूजा  में होती थी, वह किसी और पूजा समिति को नसीब नहीं।

वैसे वो मेला भी क्या था..उन दिनों जब कोक और पेप्सी पीने का चलन क़स्बे में उतना आम नही हुआ था, हमारे लिए मेले में कोक और पेप्सी, सेवेन-अप, स्प्राइट, सिट्रा, थम्ज-अप वगैरह पीने का अजेंडा सबसे ऊपर होता था। मैं शुरु से साइनस का मरीज रहा, तो घर में खूब धमाके से पीटा भी जाता, आइसक्रीम खाने और फिर ठंडा पीने की वजह से। लेकिन ..सुधर गए तो कैसे गुस्ताख़..।

मेले में खिलौने की दुकानों की खूब बहार हुआ करती। हमारे सबसे लोकप्रिय खिलौने थे, डुगडुगी। इसके दो प्रकार थे। पहले में मिट्टी की चकरी पर एक झिल्ली लगी होती और बांस की करची घुनाने पर तिगिर-तिरिग की आवाज निकलती। पूरे मेले में हम इस खिलौने से गंध मचाए रखते। अकेले हमीं क्यों..हमारे सारे दोस्त हमीं जैसे थे। दूसरा वाली खिलौना बेसिकली यही था लेकिन वह गाड़ी की शक्ल में था, बाकी चलने पर उससे भी ऐसी ही आवाज निकलती।

फोटोः मंजीत ठाकुर

 एक खिलौना था, जो बांस की खपच्ची और ताड़ के पत्ते से बनाया जाता। बांस की खपच्ची पर जोर दो, जो ताड़ के पत्ते से बने इंसान का पोश्चर बदल जाता। नाचने की मुद्रा में...माया ऐसे ही नचाती है इंसान को। माया महाठगिनी हम जानी..।

बाद में जाकर पिस्तौल हमारे लिए बहुत लोकप्रिय खिलौना साबित हुआ। हमारी सारी बचत इस खिलौने के लिए रील वाली गोली खरीदने में उड़ जाती।

एक और आकर्षण था, गोलगप्पों का। गोल गप्पे देश के बाकी हिस्सों में तो पानी बताशे, पानी पूरी वगैरह कहे जाते हैं , लेकिन बांगला में कहे जाते हैं फुचकाच और गुपचुप। फचका नाम के पीछे का इतिहास तो पता नही, लेकिन गुपचुप नाम इसलिए पड़ा होगा क्यों कि यह पूरे मुंह के साइज का होता है। मसालेदार पानी से भरा फुच्का लोग गुप्प से मुंह में लेते हैं और फिर चुप हो जाते हैं..संभवतः  इसी लिए गुपचुप नाम है।



फोटोः मंजीत ठाकुर
विजयदशमी को हमारे यहां ग्रामीण, जनजातियों की भीड़ उमड़ पड़ती है। संताल लोग।  तीर-धनुष लेकर आते तो देखा है लेकिन बेवजह किसी पर चलाते नहीं देखा। वह भी आकर गुपचुप ही ज्यादा खाते।

हम लड़को में तो गुपचुप खाने का क्रेज उतना नहीं था, क्योंकि खट्टा हमें और हमारे दोस्तों को पसंद आता नही था। लेकिन गुपचुप दुकानों के आसपास लड़कियों की भीड़ रहती थी, तो अपनी माशूका से मिलने, उसे छू लेने, या उसके साथ दो बातें कर लेने के लिए गुपचुप दुकानें सर्वोत्तम थीं। क्यों कि यही वो जगह थी जहां परिवार उन्हें सहेलियों के साथ छोड़ देता था।

दोपहर में होता खिचड़ी का भोग। खिचड़ी का भोग मुझे आज भी याद है। सखु ए के पत्ते के दोने में दिया जाता। एक कोने में पायस पड़ी होता, बस उतना ही जितना सुहागन औरते सिंदूर का टीका लगाती हैं। कोंहड़े की सब्जी, आमतौर पर जिसे घर पर खाते वक्त उबकाई आ जाती थी, वही सब्जी प्रसाद के रुप में मिलती तो स्वर्गीय सा लगता। इसका रहस्य आजतक समझ नही पाया हूं।

लगता है कि एक बार फिर बचपन के दिनों में लौट जाऊं, गले खराब होने के डर से कोसों दूर, खूब आइसक्रीम खाऊं, बॉस छुट्टी नही देगा, टिकट वेटिंग है, सेलरी में इनक्रीमेंट नही हुआ है, मुद्रास्फीति बढ़ गई है, टमाटर 40 और गोभी 30 रुपये किलों के तनाव से मुक्त हो जाऊं।

एक बार फिर गुल्लक के पैसों से बलून खरीदने को मन मचल रहा है। मेरा समवयस्क भतीजा मेरे साथ है, बलून खरीदने पर मजाक बना देगा। यहां वैशाली में भी -गुपचुप- बिक रहा है, लेकिन कहता है अंकल मत खाओ एसिडिटी हो जाएगी। शीशे के बड़े -बड़े जारो में भरे गुपचुप मधुपुर में हैं..मुझे बुला रहे हैं।

Friday, October 15, 2010

तेरे जैसा कौन उठे- हीरो जी की दास्तां

एक हैं हीरो जी। यूं तो उनका चेहरा थोड़ा-बहुत समोसे जैसा है और उस पर उनका मुख ऐसा, कि कोई अगर बहुत ध्यान से न देखे तो लगे कि चुंबनोद्यत है।

हीरो जी बहुत जड़ से जुड़े हुए आदमी हैं। ( आदमी हैं, यह मैंने ऐसे ही भलमनसाहत में लिखी है। इसे प्रमाणस्वरुप कहीं उद्धृत न कीजिएगा। क्योंकि उनके आदमी होने पर कईयों को संदेह है, और संदेह निराधार नही है)

बहुत साल हुए, मान लीजिए कि 3-4 साल हुए, और 3-4 साल बहुत होते हैं यह तो तय है, किसी ने हीरो जी के कान में फुसक दिया कि भई हीरो जी काला चश्मा लगाकर तुम बंबास्टिक दिखते हो। तब से ही अपने हीरो जी ने फिल्मी नायकों की तर्ज पर चश्मा आंखों पर कम और कॉलर में ज्यादा लटकाना शुरु कर दिया।

किसी ने हीरोजी  को यह भी बताया था कि आज कल की लड़कियां प्रायः दुश्चरित्र होती हैं और दुश्चरित्र लड़कियों को लड़कों ( पढें- मर्दों) की छाती के बाल बहुत आकर्षित करते हैं। चूंकि, हीरो जी मर्द थे और उनकी छाती में खासे बाल भी थे। नतीजतन, हीरो जी दफ्तर आते वक्त रास्ते में ही काला चश्मा शर्ट की कॉलर पर लटका लेते थे, और छाती के बाल तो उनकी ऊपर की दो बटनों के बीच से झांकते ही रहते हैं।

हीरो जी की दिली इच्छा थी कि स्साला टीवी पर दिखना है। हीरो जी का नाम सिर्फ हीरो नाम का ही न रह जाए। काम भी हीरो का हो जाए, तो उन्होंने सबसे पहले काम ये किया कि अपने गांव के पते से चार चिट्ठियां अपने चैनल हैड के नाम लिखवा लीं, अलग-अलग रंगो की स्याही से, अलग-अलग लिखावट में। ध्यान रहे, मैं आगाह कर रहा हूं- कोई हीरो जी को चूतिया या मूर्ख न समझे।

चिट्ठी का मजमून यह था कि आपके चैनल में जो हीरो जी नाम के शख्स काम करते हैं, उनके तेजोमय व्यक्तित्व के सम्मुख कामदेव भी पानी भरते हैं। अतएव फौरन से पेश्तर, रात नौ बजे का बुलेटिन हीरो जी से ही पढवाया जाए। 

बहरहाल, चैनल के बड़े विभाग में चिट्टी आई, गई कहीं खो गई।  हीरो जी का सपना अधूरा ही रह गया। लेकिन इस कवायद में उन्हें एक कैवल्य मिल गया। कैवल्य इस मामले में कि उन्हें इस बात का ज्ञान हो गया कि चैनलों में जनता-फनता होती है ठेंगे पर। जनता की बातों का कोई महत्व नहीं।

तो सवाल यह कि महत्व किसकी बात का होता है...?

नेताओं को चैनलों की जरुरत है, चैनलों को नेताओँ की। दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। हीरो जी ने ताड़ लिया।
एक ऐसे ही किसी शुभ दिन, जब बाकी की दुनिया सो ही रही थी और कौओं ने गू में चोंच भी न मारा था, हीरो जी बढिया शेव करके, अपनी सबसे बढिय़ा शर्ट पहन कर, एक नेता के घर के आगे धरने पर बैठ गए।

यह वही नेता थे जिनके साथ अपने बहुत नजदीकी संबंधों का ज़िक्र वह अपने दफ्तर में अपना रोब गाफिल करने को किया करते थे। हालांकि नजदीकी संबंधों के बारे में खुद नेताजी भी अनभिज्ञ थे।

तो जैसे ही वह धरने पर बैठे, पहले तो गार्डों ने उन्हें लात मार कर बाहर कर दिया..और बमुश्किल हाथ-पैर जोड़कर जब वह नेता जी के घर के अंदर पहुंते तो घर की सफाई का काम चल रहा था। हालांकि हमारे हीरो जी कम स्वाभिमानी नही हैं , लेकिन जब उन्होंने देखा कि कई लोग काम कर रहे हैं, जिन्हें दूसरे लोग नौकर लेकिन नेता लोग कार्यकर्ता कहते हैं। तो एक झाड़ू लेकर उनने भी बुहारना शुरु कर दिया।

कुछ देर बाद संयोग ये हुआ कि वह झाडू मार रहे थे ओर उन्हीं के दफ्तर के कुछ दूसरे लोग भी वहां आ पहुंचे। हीरो जी चालाक भी हैं, लेकिन उनकी किस्मत यहां थोड़ा गच्चा दे गई। उन्हें झाड़ू देते हुए देख लिया गया। यद्यपि उनने छिपने का भरसक यत्न किया था।

हीरो जी के नेता जी के घर में मौजूद होने की बात बॉस तक पहुंच गई। बॉस समझदार था। उसने समझ लिया कि घर के अंदर तो नजदीकी रिश्तेदार ही होते हैं।

हीरो जी का आजकल बॉस से खूब पटती है। चैनल है़ड हीरो जी को पुलित्जर के लिए नामांकित करवाने की सोच रहा है।

अर्ज है---

हर दिशा में छा गए तुम,
जो भी चाहा पा गए तुम।
क्या करें हम टहनियों का
फल तो सारे खा गए तुम।
क्या गजब के आदमी हो,
फांद कर के आ गए तुम।
क्या जुगाडू लग रहे हो,
बॉस को कैसे भा गए तुम।

Saturday, October 9, 2010

जिंदगी तू क्या है-कविता

जिंदगी तू क्या है,
चुटकुला या ललित निबंध?
महाकाव्य, चंपू-काव्य या उपन्यास...
या किसी टीवी रिपोर्टर की
कोई सड़ी हुई टीआरपी स्टोरी...
या किसी अखबार की है,
कोई एंकर स्टोरी..
या फिर किसी मसाज पार्लर का वर्गीकृत विज्ञापन...?

 

Friday, October 8, 2010

खुले बालों वाली लड़की- चौथी किस्त

तीसरे अंक से आगे....

अभिजीत ने खुद को बंटा हुआ पाया।

अनामिका का हताश होता जा रहा प्रेमी...अपनी पत्नी का पति...या फिर अपने बेटे का बाप...जिसे कोई गैर-जिम्मेदार कहता है कोई अभागा...।


अभिजीत को सिर भारी लगने लगा। लगा, किसी ने माथे पर चक्की रख दी हो। पेट में पहले से ही दर्द था..डॉक्टर ने क्या कहा वह सिर्फ प्रशांत को पता है। जहां तक अभिजीत को बताई गई थी, वह जान गया था कि अब उसकी जिंदगी में दर्द हमेशा हमसफर बनकर रहेगा।

डॉक्टर ने  यही बात कही थी..दर्द हमेशा रहेगा।


लेकिन नासपीटे डॉक्टर को क्या मालूम कि यही चीज तो अभिजीत के साथ हमेशा रही है। कभी दिल में, कभी पेट में, और कभी दिमाग में..दर्द ।

अभिजीत ने जितना दर्द सहा, उतना ही बांटा भी शायद। यही बात  अनामिका कहती थी। अना को नही मालूम की अभिजीत दर्द के उस मुकाम पर पहुंच गया है, जहां से वापस लौटना नामुमकिन है। कौन बताएगा उसे... ?

अभिजीत को लगा सूरज का सारा भार उसी के सर पर है।

सूरज सिर पर चढ़ता जा रहा था..। उन्ही दोपहरों में लंच साथ खाए जा रहे थे..बातों का सिलसिला लंबा खिंचने लगा था, कॉफी और चाय साथ पी जा रही थीं..और मोबाइल फोन के इनबॉक्स सिर्फ अनामिका के मेसेज से भरे पड़े होते थे।

छोटी-छोटी बातों के संदेश। आज ये खाया, ये पहना ..यहां गई, उससे मिली। बातों का अनंत सिलसिला...रिपोर्ट फाइल करने के बाद भी अनामिका की एक झलक पाने को वह दफ्तर में जमा रहता।

जब भी अभिजीत अनामिका के सामने रहता...वह अचानक अपनी घनेरी जुल्फें खोल लेती। अना की जुल्फों के आगे काहे का सावन..और काहे के आषाढ़ के मेघ।

बाहर बादल फिर बरसने लगे थे।

अबकी बार  दिल्ली में आषाढ क्या, सावन क्या और क्या भादों, जमकर बरसात हुई है।

वह भी बरसात का ही मौसम था...न्यूज़ रुम में अना के खुले बाल... बाहर शची इंद्राणी के।  हरे पेड़ो की पृष्ठभूमि में गिरती बौछारें कभी भी ऐसी भली नहीं लगी थीं उसे। अभिजीत कभी बरसात के इस रोमानी अंदाज को पहचान ही नही पाया था। बचपन में बरसात का मतलब था, गिलास-कटोरी जो भी मिले लेकर दौड़ जाना और उस जगह पर लगा देना, जहां से खपरैल टपकती थी।

घनेरी जुल्फें खुलतीं तो अंधेरा छा जाता। लेकिन उस अंधेरे में अभिजीत की ज़बान बंद हो जाती। वह कई दिनों तक पेशोपेश में पड़ा रहा।

पहले खबरों के  मेसेज, फिर चुटकुले..फिर आपसदारी की बातें..हॉबीज़। मोबाईल हरदम हाथ में. पता नही कब मेसेज आ जाए। फिर बातों का सिलसिला...।

बातों का सिलसिला कभी खत्म नहीं होता। दफ्तर के पीछे लॉन में अभिजीत दिन में कई बार जाकर सिगरेट फूंक आता, और बोगनवेलिया के गाढ़े हरे रंग के पत्तों पर उसका नाम नाखूनों से लिख आता। घनेरी जुल्फों को मादक बना देती थीं, उसकी गहरी आंखें। सांवली-सी सूरत...अभिजीत ठगा-सा रह जाता था।

ठगा-सा एक बार फिर रह गया अभिजीत जब सूरज सिर के ऊपर से निकल कर उसकी छाती  की ओर चढ़ गया और प्रशांत ने धमक कर कहा, 'चलो।'

'किधर....?'

'हम पहाड़ों की तरफ चल रहे हैं...शायद अल्मोड़ा, या नैनीताल ...कहीं भी।'

'काहे भाई..।'

'हरिद्वार नजदीक पड़ेगा साले।' प्रशांत ने चिढ़कर कहा।

'हां हरिद्वार नजदीक पडेगा, लेकिन बरसात का मौसम है, मर गया तो लकडियां भी गीली मिलेंगी। धुआं-धुआं कर जलूंगा।'

वैसे ही स्साले कौन सा उपकार कर रहे हो जीकर..प्रशांत ने फिर से कहा। ...'तुम्हारे तलाकनामे के पूरे काग़ज़ात आ गए हैं। टेबल पर रख दिए हैं। ....चूतिए.... पैदा हुए थे तो क्या कपार पर कुत्ते से मुतवा कर आए थे..' यह चिढ नही थी, बरसों पुराना दोस्ती का प्यार था।