Thursday, February 24, 2011

अथ 'पहुंचेली' कथा उर्फ....मुहब्बत एगो चीज है-तीसरा हिस्सा

...अचानक आंखें खुली तो सूरज बाहर कहीं बहुत ऊपर उठ आया है इसका अहसास हो रहा था। रात का नशा सिर पर ऐसे चढा हुआ था मानो किसी ने चक्की रख दी हो ...।

रात को जो भी हुआ था, अक्षर-अक्षर याद है।

देखा हुआ सा कुछ है तो सोचा हुआ सा कुछ,
हर वक्त मेरे साथ है उलझा हुआ सा कुछ।।

साफ-सुथरा होकर चाय बनाने में लगा हूं..। इवनिंग शिफ्ट है। वापसी रात ग्यारह बजे के बाद ही होगी, यानी संध्यावंदन के लिए इंतजाम दफ्तर में ही करना होगा, अगर किसी खास कवरेज में न उलझना पड़े।

तभी देखता हूं मोबाईल फोन की घंटी बज रही है। कोई अनजान सा नंबर है..एक ऐसा नंबर जिस पर आज से पहले कभी बात नही हुई।

"हलो"...
उधर से एक मीठी सी आवाज...मैं चौंकता हूं। आवाज पहचानी तो कत्तई नहीं है। इधर फोन पर बात कर रहा हूं..चाय उबलकर गिरने को तैयार है..दरवाजे पर घंटी बजती है।
मैं पूछता हूं--"कौन..?"(कूड़े वाला है।)
उत्तर मिलता है- "पहुंचेली।" पहुंचेली कहने के बाद एक खनकती हुई हंसी ...जनाब आवाज इतनी मीठी..खनक ऐसी की चांदी के सिक्कों में भी न हो।

वॉयस ओवर के लिए परफैक्ट..लोन बांटने के लिए परफैक्ट..एक ही कॉल पर लोग लोन लेने और फिर लौटाने को तैयार हो जाएँ।

"अरे पहुंचेली जी नाम क्या है आपका..?"
"कहा तो पहुंचेली..."फिर हंसी।
"अरे वास्तविकता तो बताइए..!"
"वास्तविकता पहुंचेली है –आप पता लगाएँगे तो कोई मेरा नाम तारा झावेरी बताएगा कोई महामाया सेनगुप्ता...." फिर एक खनकदार हंसी।

मुझे ऐसे में बहुत गुस्सा आता है, या तो हंस लो या बातें कर लो।

"सुनो...तुम मुझे कितना चाहते हो?"---- वह फोन से निकल कर सीधे सामने आ खड़ी हुई। काजल से पुती बड़ी-बड़ी गहरी आंखों में मैं कूद गया। मुझे तैरना नहीं आता..आंखों में तो बिलकुल नहीं। तैरना न सही..भींग गया बुरी तरह। "सुनो ना...
.....
"तुम मुझे कितना पसंद करते हो।"
"बहुत.."
"बहुत कितना.."
"बहुत ज्यादा.."
"तो सुनो...मेरा एक काम करोगे..?"
"क्या..."
"मुझे ऊपर चढ़ना है..तुम्हारे कंधे पर सीढी रखनी है। प्लीज अपने कंधे पर सीढी लगा लो, जब मैं ऊपर से वापस लौटूंगी तो तुम्हारे छिले कंधों के लिए मरहम लेती आऊंगी...पक्का। प्रॉमिस..."

इतना कह कर वह फिर फोन में घुस कर एक नंबर बन गई...मुझसे कोई जवाब देते नहीं बन रहा था। आखिर महामाया सेनगुप्ता उर्फ तारा झावेरी उर्फ पहुंचेली चाहती क्या है...

"तुम्हारे पास सोचने का बहुत वक्त है..शाम में फिर फोन करुंगी...बाय ..".फिर खनकती हंसी।

मैं नंबर सेव करने में लग गया। हम नंबरों को नाम देकर पता नहीं क्यों निंश्चित हो जाते हैं।

7 comments:

ज्ञानचंद मर्मज्ञ said...

sundar prstuti!

rinku said...

पहुचेली का नंबर तो मिल गया,
अब बात भी हो ही जाएगी,
प्रेमकथा ऐसी ही तो होती है,
गुरुदेव........

Rahul Singh said...

अच्‍छी रवानी है, आगे बढ़ने दें किस्‍सा.

ktheLeo said...

"सच में" पर आपके आने और बेबाक तारीफ़ का शुक्रिया, आते रहें!

Patali-The-Village said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति| धन्यवाद|

Rahul Singh said...

इस पहुंचेली का कुरु कुरु स्‍वाहा से कोई रिश्‍ता.

गुस्ताख़ मंजीत said...

राहुल सर, यह पहुंचेली कुरु कुरु स्वाहा से ही आई है..उसी का विस्तार भर है। रेफरेंस वहीं से लें...