Saturday, September 24, 2011

अजीब `मौसम` है ये , बिखरा-बिखरा बिगड़ा-बिगड़ा सा...

मौसम किसी का भी मूड बिगाड़ने की काबिलियत खुद में समेटे है। कॉमेडी , ट्रेजेडी, रोमांस का ये दमघोंटू कॉकटेल पंजाब के मल्लूकोट, कश्मीर , अहमदाबाद, स्कॉटलैंड और स्विटजरलैंड के बीच दर्शकों को चकरघिन्नी के माफिक नचाती है।

पंकज कपूर की इस चिरप्रतिक्षित फिल्म से लोगों को किसी भी मौसम और मूड में निराशा ही हाथ लगेगी, अभिनय के महारथी पंकज कपूर फिल्म निर्देशन के अखाड़े में पस्त हो गए। पंजाब और कश्मीर से शुरु हुआ फिल्म का सफर अहमदाबाद जाकर ही खत्म हुआ ।


जादू की कमी इस मौसम में, पंकज कपूर ने निराश किया

शाहिद और सोनम के गंगा-जमुनी प्यार की गाड़ी जब भी रफ्तार पकड़ती , जहरीला जमाना अयोध्या , बंबई, कारगिल , 9/11 की शक्ल में प्यार के इन पंछियों को मानो साजिशन विपरीत दिशा में उड़ने को मजबूर कर देता... खैर मासूम रज्जो के अनवरत प्रेम ने भी कुछ कम नुकसान नही पहुंचाया ।

अन्त तक आते आते दर्शकों का दिल घबड़ाने लगा कि शाहिद-सोनम के अटूट प्यार को दिल्ली हाइकोर्ट की नजर न लग जाए... पंकज कपूर को धन्यवाद कि आशंका आशंका ही रही और शाहिद-सोनम के प्यार को दिल्ली की नजर नही लगी।

शाहिद ने अदाकारी के जलवे, लेकिन फिल्म घटनाजाल में उलझी

हकीकत फिल्म के एक मशहूर गाने की लाइन है- कहीं ये वो तो नही , लेकिन दर्शकों के सामने दूर-दूर तक ऐसा कोई कंफ्यूजन नही। दर्शक पंकज कपूर से काफी कुछ ज्यादा की उम्मीद लगाए थे, और खासकर तब जबकि मुख्य किरदार के चोले में खुद उनके सुपुत्र हों ।




पोस्ट स्क्रिप्ट-- कुछ घोर टाइप के दर्शक गौरी, गजनबी, मुगल और सन सैंतालीस की कमी महसूस करते दिखे और सुनाई भी दिए।
 
( इस समीक्षा के लेखक रजनीश प्रकाश हैं। फिल्मों के शौकीन और प्रायः हर फिल्म देख लेने वाले रजनीश मौसम देखने के बाद से बहके-बहके और परेशान से घूम रहे हैं। कहते हैं पंकज कपूर ने उन्हें ठग लिया)

4 comments:

शांति दीप said...

गुरुदेव,
अधिकतर लोगों का कहना है की अगर एडिट टेबल पर भी कुछ काम हो जाता तो बात कुछ कम बिगडती लेकिन पंकज कपूर ने जो भी शूट किया सब दिखा दिया, "कुछ" तो बचा लिया होता.....

Vinay Prajapati 'Nazar' said...

ab itni bhi buri nahi hai jee...

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

अच्छी समीक्षा ..

नीरज गोस्वामी said...

टुकड़ों में कहीं कहीं फिल्म अद्भुत है...फोटोग्राफी कमाल की है...अभिनय भी अच्छा है लेकिन कहानी ने सब मटियामेट कर दिया...बाकी कुछ बचा तो लम्बाई मार गयी...

नीरज