Saturday, June 9, 2012

सुनो ! मृगांका: 12 : हमारी अधूरी कहानी...

दिल्ली

मृगांका जब स्टूडियो से बाहर निकल रही थी तो चांद आसमान में आधी दूरी तय कर आया था। चांद देखते ही उसे याद आया, अभिजीत से उसने पूछा था कभी। बहुत शुरुआती मुलाकातों में...शायद तब, जब प्यार पनपा भी न था। हालांकि, मृगांका को और अभिजीत को भी हमेशा लगता रहा कि उनके बीच का प्यार पनपा नहीं है, जन्म-जन्मांतर का है।

बहरहाल, बहुत शुरुआती मुलाकातों में ही उसने पूछा था, 'पता है आपको मृगांका का मतलब...?'
अभिजीत विज्ञान का छात्र रहा था...फिर भी ना में सिर हिलाने से पहले अंदाजा लगाया था, 'मृग मतलब हिरन, और अंक यानी गोद...मृग जिसकी गोद में हो।'

मृगांका खूब खिलखिलाकर हंसी थी। उसे आज भी याद है कैसे मुंह बाए उसे हंसता देखता रह गया था अभि। एक दम मासूम बच्चे सरीखा। उसने तब बताया, 'सर, मृगांका का अर्थ होता है चांद।' हालांकि, कोई सर कहे खासकर मृगांका तो अभि को बहुत कोफ़्त होती थी। लेकिन उस वक्त वह, चांद...चांद  दुहराता रह गया था।

कैसे वह पार्किंग से कार निकाल लाई। कैसे पूरा शहर पार करते हुए महारानी बाग के अपने घर आ गई, ये उसे खुद भी याद नहीं। पापा खड़े ही थे...अब भी जगे हैं।

पापा आजकल उसका कुछ ज्यादा ही खयाल रख रहे हैं। पापा को रोज़ शाम आठ बजे ही खा लेने की आदत है। उन्ही की वजह से किचन में हर रोज़ शाम छह बजे ही खाने की तैयारियां शुरु हो जाती हैं।

"अरे छोटू, तुमने तो कमाल कर दिया।'
'पापा...!, उसने लाड से कहा, 'अब तो छोटू न कहा करो।'
पीछे से मम्मी ने कहा, 'ठीक ही तो कहती है, उसे गुड़िया क्यों नहीं कहते। इतनी बड़ी हो गई है, नाम हो गया है कोई छोटू सुनेगा तो....?'

दीदी ओर जीजा जी आए हैं। वो लोग भी मुंह दबाए हंस रहे हैं। पहली-पहली बार अभि ने भी सुना था उसका निक नेम छोटू...तो हंसते-हंसते उसकी पेट में बल पड़ गए थे। पापा, मम्मी, दीदी-जीजा जी सब खा चुके हैं, लेकिन सब डायनिंग टेबल पर उसकी ओर देख रहे हैं।

मृगांका की कोई रुचि खाने में नहीं है। बार-बार विस्फोट में मारे गए उस लड़के की वो खूबसूरत आंखें घूम जाती हैं, अभि की आंखें भी ऐसी ही थीं। मंझोले आकार की आंखे, जिनको ज्योतिषी लोग मीन नेत्र कहते हैं। मृगांका सोच में डूबी है...मेज पर सब उसे घूर रहे हैं। उसकी उंगलियां थाली की बजाय मेज पर घूम रही हैं।

'बेटा खाने का मन न हो, तो सो जाओ। '
'जी मम्मी'
पापा को ठीक नहीं लग रहा। बेटी मेहनत कर रही है। शोहरत कमा रही है, दुबली न हो जाए।

साढ़े तीन बजने को आए रात के, बल्कि सुबह के। थोड़ी देर में पौ फट जाएगी। फटाफट मृगांका ने लैपटॉप ऑन कर लिया। यह उसका रोजाना का काम है, फेसबुक पर सर्च करना, अभिजीत का नाम। मृगांका का दिमाग कंप्यूटर के साथ-साथ चल रहा है। जैसे उस नाम को क्लिक से पहले खोज लेना है। हर नेटवर्किंग साइट में हर रोज़ खोजना...मृगांका के नयन मृग से तेजी से कुंलांचे भर रहे हैं। इस नाम से जितने भी मिले हैं फेसबुक पर...किसी में अभि वाली बात ही नहीं। किसी ने हृतिक रोशन की तस्वीर लगाई है तो किसी ने अपनी ओरिजिनल भी लगाई है। नाः इनमें मेरा अभिजीत कोई नहीं। ट्विटर भी डि-एक्टिवेट है।

एक हाथ से की-बोर्ड, एक से मोबाईल पर वही पुराना नंबर। नंबर दबाया...हमेशा की तरह नंबर बंद होने की मनहूस खबर।

मृगांका को लगा पता नहीं दोबारा अभि को देख भी पाएगी या नहीं। कहते फिरते हैं सब कि दुनिया छोटी हो गई, और दुनिया एक गांव हो गई है। तो इस गांव में मेरा अभि आखिर है कहां....।

उसने आखिरकार आलमारी से डायरी निकाल ली। इसमें अभि के दिए कुछ फूल हैं..सूखे हुए। लेकिन इनकी खुशबू कभी ख़त्म नहीं होती। उसने एक बार उन फूलों को सूंघा। डायरी पलटने लगी तो एक पेज पर जाकर रुक गई।

तीन साल पहले की तारीख में उसने लिखा था कभीः

मीटिंग यू वाज़ फेट, बिकमिंग योअर फ्रेंड....तुमसे मिलना किस्मत की बात थी, तुम्हारी दोस्त बनना मेरी पसंद। लेकिन तुम्हारे प्यार में पड़ना...मेरा इस पर कोई वश नहीं चला...

तभी उसे ध्यान आया अरे, अभि तो ऑर्कुट पर भी था एक्टिव। पता नहीं हो या नहीं हो। उसने डायरी एक तरफ रखी और सीधे ऑर्कुट पर चेक किया। एक उम्मीद भरी मुस्कान उसके चेहरे पर खिल गई। अभिजीत...प्रोफाइल खुलते ही जैसे माइस जाकर उसी पर ठहर गया।

उसकी वो प्रोफाइल फोटो....ये तो वही है। अभि शायद ऑर्कुट डिएक्टिवेट नहीं कर पाया। फोटो देखते ही मृगांका का सब्र टूट गया। आंखें नम हो गईँ। ये फोटो तो मेरी ही क्लिक की हुई है। एक क्लिक के लिए कितना नाक-भौं सिकोड़ा था। बहाने बनाए थे...इस मोबाइल से क्या खिंचवाना फोटो। भदेस हूं, घटिया फोटो आएगा, रवि से कह के खिंचवा लेना चाहे जितना...लेकिन मृगांका कभी न तो ऐसे मौको पर मानी थी..ना मानी।

प्रोफाइल पर डेढ़ साल पहले का अपडेट....मेमरीज़। पढ़ने पर लगता है सामने खड़ा हो गया हो। मेमरीज़ क्यों लिखा। क्या हुआ...मृगांका को एक साथ आशंकाएँ भी हुईं, डर भी लगा। क्या हुआ अभिजीत के साथ...मृगांका की नजर एक बार फिर अपने डायरी के पन्नों पर पड़ी,

कितनी हैरत हुई है मुझे, कि किसतरह से मेरा दिल मेरी सारी हिदायतें भूल बैठा है...किसतरह ये एक अजनबी की गिरफ़्त में आता चला गया है...अजनबी?? नहीं, वो अजनबी तो नहीं।

अचानक कमरे की बत्ती जल गई। पापा थे, 'अरे बेटा सो जाओ। '
'जी पापा'
मृगांका ने लैपटॉप की ओर देखा, अभि की वही तस्वीर अब उसके लैपटॉप का स्क्रीनसेवर बन चुका था। अभिजीत के तमाम फोटो वाले फोल्डर में सारी तस्वीरें सेव कर ली गई थीं।

पापा ने धीरे से सिर हिलाया, 'सुबह कब जाना है....?'

'नौ बजे जरा आरएमएल अस्पताल जाऊंगी, ब्लास्ट के सारे विक्टिम वहीं ले जाए गए हैं। कुछ एम्स के ट्रॉमा सेंटर में भी हैं। जाऊँगी...जरा देख आऊं।'
'ठीक है बेटा। '

पापा को खुशी है कि अपनी निजी तकलीफों के बावजूद बेटी ने कभी कर्तव्य का रास्ता नहीं छोड़ा। गरीब बच्चों का पढाना, झुग्गीवालो-वंचितों के घर जाकर उनकी महिलाओं को सहारा देना, उनके सुख-दुख में काम आना...अभिजीत के गम के बावजूद इसने कभी नहीं छोड़ा।

पापा ने स्विच ऑफ़ कर दिया। अंधेरा हो गया। मृगांका को लगा कि उसे अभिजीत कहीं से बुला रहा है...किस मुसीबत में है अभि...। पिछले तीन साल से यही सोचती है हर रात...हर रात रतजगे में सुबह कर देती है।

मृगांका.....मृगांका....उफ।

फिलहाल तो घना अंधेरा है।

2 comments:

शिखा कौशिक said...

pahli bar aapke blog par aayi hun .nice blog .badhai.

Anonymous said...

बधाई......मृगांका की भावनाएं,छटपटाहट खुल कर कहानी में आ रही है....बेहतरींन.........