Wednesday, October 23, 2013

किताबः द अलकेमी ऑफ़ डिज़ायर

किसी ने मुझे एक किताब उपहार में दिया था...द अलकेमी ऑफ डिज़ायर। लेखकः तरूण तेजपाल। पहली ही पंक्ति पढ़ी, दो जनों को बीच से जोड़ने वाला गोंद प्यार नहीं है, सेक्स है। ( लव इज़ नॉट द ग्रेटेस्ट ग्लू बीटविन टू पीपल। सेक्स इज़। )

किताब की पहली पंक्ति की इस स्थापना से हैरत हुई। पढ़ता चला गया। कुछ ऐसा हुआ कि अंग्रेजी की किताब को लगातार पढ़ नहीं पाया। व्यस्तताओं का दौर था। लेकिन पूरा पढ़ा, तो आखिरी पंक्ति, पहली पंक्ति की एंटी-थीसिस लगी।

दो लोगों को बीच से जोड़ने वाला गोंद प्यार है, सेक्स नहीं। (सेक्स इज़ नॉट द ग्रेटेस्ट ग्लू बिटविन टू पीपल, लव इज़।)

पूरी किताब इन्ही दो स्थापनाओं के बीच की कहानी है।

मैं शैली की इस किताब का नायक लेखक खुद ही लगते हैं, क्योंकि किताब के आखिरी पन्नों तक आते-आते नायक पोनी टेल वाला और दाढ़ी वाला हो जाता है। किताब प्रेम, कर्म, अर्थ, काम, सत्य के खंडों में बंटा है।

प्रेम से शुरूआत होती है, नायक और नायिका के हर पल के शारीरिक प्रेम से...इक दफा यौनसंबंध बनाने मे नाकाम नायक के साथ संबंध टूटने की शुरूआत होती है।

नायक लेखक ही है और उसकी नायिका फिज़ प्रेरणा। हर पल उसे लिखने की प्रेरणा देती हुई। इसी में बाद में आकर कैथरीन का प्रकरण भी जुड़ता है। शाही खानदान की गोरी अमेरिकन बहू अपने नौकर के साथ अराजक यौन संबंधों में लिप्त होती है। उस संबंध का अंत भी होता है।

इतिहास के एक टुकड़े को नायक जीता है और आखिरकार विभिन्न यौन आसनों, यौनांगो के विवरणों के बाद लेखक आखिरी पन्नों में स्थापित करता है कि सेक्स नहीं, प्रेम ही लोगों को जोड़ता है।

किताब की भाषा शैली सहज है, प्रवाहमान है। लेकिन कई जगह विवरण काफी बोझिल हो जाते हैं। और कई घटनाक्रम तो ऐसे हैं जिनका होना-न होना किताब के कथ्य पर कोई फर्क नहीं डालता। मसलन, एक लघु चित्र देने के लिए लेखक  का अमेरिका जाना।

सबसे बेहतर है, नायक और फिज़ का आपसी रिश्ता। किताब में एक जगह नायिक लेखक के लिए रोज़मर्रा के कामकाज की तालिका बनाती है, 

"सुनो तुम बहुत अच्छा लिखते हो, फिज़ ने लाल रंग की चमचमाती टाइपराइटर, बढिया कागज का रिम, पेंसिले जमाते हुए कहा। दैनंदिनी लिख कर टंग गई। हफ्ते में लेखन के पांच दिन, कोई फिल्म नहीं, काफ्का, जायस और फाकनर की रचनाएं नहीं पढ़नी हैं। सेक्स के बारे में नहीं लिखना है, क्यों कि इसका सही चित्रण मुश्किल है, हां गंदगी फैलाना आसान होता है। जो लिख रहे हो, उसकी चर्चा न करो...दुनिया में अपठनीय कूड़े की भरमार है, उसमें बढोत्तरी न करो। फिज़ की इस कठोर नियमावली के नीचे मैंने नोट लिख रखा था, लिखन जिंदगी नहीं, लेकिन फिज़ जिंदगी है। फिज़ ने पढ़ा, तो उसने 'नहीं' लफ्ज को काट दिया। दूसरे वाक्य में फिज़ जोड़ दिया। वाक्य बना, लिखना जिंदगी है, फिज़, फिज़ है।" --पुस्तक अंश।

नायक नायिका जब हिमालय की घाटी के गेथिया नामक जगह पर रहने के लिए आते हैं, तब उसे घर की पुरानी मालकिन की डायरियों से भरी पेटी मिलती है। तब खुलता है एक दूसरी दुनिया का, दूसरे वक्त का दरवाजा। अलकेमी ऑफ डिजायर एक दर्जन से ज्यादा भाषाओं में अनूदित हो चुका है। 

यह किताब सेक्स के बारे में बात करने से बचने की हमारी हिपोक्रेसी पर गहरे चोट करती है। यह एक ऐन्द्रिक किस्म का उपन्यास है। 

इस किताब का हिन्दी अनुवाद राजकमल ने छापा है, शिखर की ढलान नाम से. राजकमल से शिकायत इस बात की है कि अनुवादक का नाम महीन अक्षरों में कहीं छिपाकर छापा है, परिचय वगैरह भी नहीं है। दोयम, देवेन्द्र  कुमार ने अनुवाद तो तकरीबन ठीक किया है। लेकिन, यौनांगों के नाम जहां अंग्रेजी में धडल्ले से लिखे हैं, वहां उन्होंने डॉट्स छोड़ दिए हैं। 

हिंदी वालों को इस हिपोक्रेसी से बचना चाहिए। 

कुल मिलाकर अलकेमी ऑफ डिजायर को पढ़ना बनता है। आप चाहें, अंग्रेजी में पढ़ें या हिंदी में, बहुत ज्यादा फर्क नहीं है..लेकिन मूल अंग्रेजी की किताब अलग जायका देती है। अनुवाद तो अनुवाद है। 




5 comments:

प्रवीण कुमार झा said...

बहुत बढ़िया.. सच में इ विषय पे चर्चा से अपन समाज बचैत रहैत या जाकर नुकसान बेसी ऐछ !

प्रवीण कुमार झा said...

बहुत बढ़िया.. सच में इ विषय पे चर्चा से अपन समाज बचैत रहैत या जाकर नुकसान बेसी ऐछ !

प्रवीण पाण्डेय said...

हम मन को शरीर का अंग मानना बंद कर देते हैं और नये सिद्धान्तों की स्थापना में लग जाते हैं।

Pradeepika Saraswat said...

दो लोगों को बीच से जोड़ने वाला गोंद प्यार ही है, सेक्स नहीं... किताब पढने की उत्सुकता तो जगा दी इस आलेख ने पर आप से और बेहतर की उम्मीद रहती है.

अनूप शुक्ल said...

अच्छी लगी किताब की समीक्षा।