Saturday, January 24, 2015

आवारापनः किष्किन्धा से बहमनों की धरती की ओर

उस वक्त हम गुलबर्गा में थे। कर्नाटक का हैदराबाद की तरफ वाला इलाका। हंपी से उत्तर। मेरे कमरे में बालकनी है, सामने एक इमली का पेड़। 

मौसम बेहद गर्मी का था। इमली का पेड़ झुलस रहा था...गरमी में। दिल्ली में भी गरमी रही होगी।...झुलसाने वाली तो नहीं...लेकिन उत्तराखंड की बाढ़ के बाद बारिश से सहमे हुए लोगों के बीच उमस की मार है। 


गुलबर्गा की गरमी अजीब है। पत्थर भी चटक जाते हैं। लेकिन फारसी में तो गुल का मतलब है "फूल" और "बर्ग" का मतलब है पत्ता। जाहिर है, जमाना रहा होगा जब गुलबर्गा विलासिता भरे जीवन का केन्द्र रहा ही होगा। 

हमारे गेस्ट हाउस के नजदीक ही है गुलबर्गा का किला...14वीं सदी का। मजबूत रहा होगा किला। लेकिन कई दशकों तक उपेक्षित रहे इस किल में अब कई घर बस गए हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधीन  होने के बावजूद किले के भीतर अवैध अतिक्रमण है। और किले की हालत का तो कहना ही क्या।

हालांकि कुछ हिस्सों में हालत में सुधार है वो भी सिर्फ एएसआई के कारण। 

वैसे गुलबर्गा की कहानी तो 13वी और 14वीं सदी तक पीछे ले जाती है। दक्कन के इस इलाके में जब बहमनी सल्तनत का प्रभुत्व हुआ। इससे पहले यह इलाका हिंदू राजाओं के अधीन था। इस सूखाग्रस्त इलाके को बहमनी सुल्तानों ने खूबसूरत महलों, किलेबंदियों और सरकारी इमारतों से भर दिया।

आज के गुलबर्गा में भी वही मध्यकालीन किले, अस्तबल, टूट-फूट रहे मकबरे, बड़े दरबार और प्राचीन मंदिर हैं। 

किले के भीतर का जामा मस्जिद की खासियत इसका विशाल गुंबद है। इसके चारों तरफ छोटे-छोटे गुंबद भी हैं। इसका निर्माण सन 1367 में स्पेनी वास्तुविद् ने किया था जिसमें मेहराबदार प्रवेशद्वार है। बताया जाता है कि ऐसी ही कलाकृति स्पेन में कार्दोवा के मकबरे की भी है। 

गुलबर्गा अब किलों, दरबारों और मकबरों को विरासत के रूप में देखता है। मुसलमान आबादी में एक नवाबी ठसक है...लेकिन गांव की आबादी जूझ रही है। रोज़ रोज़ की लड़ाई है, पानी की, खाने की...

इस इलाके की इन कहानियों और तस्वीरों को अगली पोस्ट में शेयर करूंगा। 

1 comment:

राजेंद्र कुमार said...

बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति। वसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएं।