Sunday, May 21, 2017

भावनाएं आहत होने की मूर्खता के पैमाने

सोशल मीडिया पर मूर्खता के तय पैमाने नहीं हैं। अगर मैं ऐसा कह रहा हूं तो इसके पीछे वैलिड रीज़न है। कई मिसालें है, लेकिन आज मिसाल दूंगा हालिया एक पोस्ट पर मचे हड़कंप की।

हड़कंप मचा है मुजफ्फरपुर नाउ नाम के एक फेसबुक ग्रुप पर। हड़कंप क्यों मचा और उसके बाद क्या हुआ उससे पहले ज़रूरी है कि अनु रॉय नाम की मुंबईवासी लेखिका का ओरिजिनल पोस्ट पढ़ा जाए।

अनु रॉय का ओरिजिनल पोस्टः

फेसबुक में एक ग्रुप पर लिखा अनु रॉय के पोस्ट का स्क्रीन शॉट


वो सारी लड़कियाँ चरित्रहीन होती हैं जो,

- शॉर्ट्स में घूमतीं हैं
- जिनके ब्रा का स्ट्रेप दिखता है
- जो सिगरेट पीती हैं नुक्कर पर खड़ी हो कर
- जो मंगलसूत्र टाँग कर नहीं घूमतीं
- जिनके पैरों में बिछुय्ये नहीं होते
- जो पिरीयड पर बात करती है खुले में
- जो शादी के बाद भी पुरुषों से बात करती है
-जिनके पुरुष मित्र शादी के बाद बनते है
- जो सिंदूर नहीं लगाती
- जो पति का फ़ोटो कलेजा से सटाये नहीं घूमतीं
- जो समाज के बनाए नियमों को तोड़ कुछ अलग करना चाहतीं हैं!


वो सबकी सब चरित्रहीन होती है! मुझे चरित्रहीन लड़कियाँ पसंद हैं क्यूँकि वो ज़िंदा हैं, सिर्फ़ साँस लेती चलती फिरती कठपुतलियाँ नहीं हैं। चरित्रहीनता से अगर तुम्हारा अस्तित्व है तो चरित्रहीन होने में कुछ ग़लत नहीं है। बाक़ी तो सीता को भी एक गँवार धोबी जज करता है और उसका पति छोड़ देता है उसे। और वही पति भगवान है! ख़ैर!

PS :- लिस्ट में कुछ रह गया हो तो बता देने कष्ट करें हम अप्डेट कर देंगे
----------------------------------------------------------------------

बहरहाल, लड़कियों के कपड़े पहनने पर मुजफ्फरपुर के लोगों के इस ग्रुप की भावनाएं आहत हो गईं। संभवतया लड़कियों का खुलकर बोलना इस ग्रुप के करीब एक लाख पैंसठ हजार लोगों को ठीक नहीं लगा। या यह भी हो सकता है, कि सीता पर उंगली उठाने वाले धोबी का गंवार कहना लोगों को पसंद नहीं आया। या राम पर उठा कोई भी सवाल ही नही जंचा लोगों को।

इस पोस्ट के बाद उस ग्रुप में अनु रॉय को दी जाने वाली धमकियां, निन्दात्मक टिप्पणियों, गाली-गलौज और इनबॉक्स में की जाने वाली अश्लील बातों से क्या साबित होता है? जो भी हो, लेकिन उस ग्रुप में कुछ लोगों ने कानूनी कार्रवाई की धकी दी तो ग्रुप के एडमिन ने पोस्ट डिलीट कर दी, पर मुझे नहीं लगता कि उस पोस्ट में ईशनिन्दा जैसा कुछ था। या राम के जिस काम पर उनके भक्त भी सवाल उठाते हैं, उस पर सवाल खड़ा किया जाना कहां से भावनाएं आहत करने वाला हो गया।

मैं एक बात और कहना चाहूंगा, उन मूर्खों से जो इस बात को राम का अपमान समझ बैठे। एक बार जरा मिथिला का दौरा कर आएं। राम मिथिला के जमाई हुए क्योंकि सीता से बियाहे गए। सो मिजाज़ के हिसाब से मिथिलावाले राम को अपने तरीके से बधाई देते हैं। लेकिन राम के लिए मिथिला के लोग आज भी उदासीन हैं।

रामचंद्र आज तक जवााब नहीं दे पाए कि वह सीता को अपनी मर्यादा पुरुषोत्तम वाली छवि की खातिर जीवन भर क्यों प्रताड़ित करते रहे। एक धोबी के बोल पर पत्नी को घर से निकाल दिया। यह भी नहीं सोचा कि वह आठ महीने की गर्भवती हैं, जबकि आठ महीने की गर्भवती स्त्री को लोग एहतियातन घर की चौखट से कदम बाहर नहीं करने देते। न कोई फरियाद का मौका दिया।

आज की तारीख में अगर यह सब होता तो भगवान् राम आज मिथिला के किसी कोर्ट में मुकदमे की हाजरी दे रहे होते। उन्हें खुद पर ही विश्वास नहीं था, जबकि वह एक बार खुद ही सीता की अग्नि-परीक्षा ले चुके थे।

यह तो रामचंद्र का खानदानी दोष है। पिता ने एक नौकरानी के कहने पर पुत्र को वनवास दे दिया और पुत्र ने एक धोबी के कहने पर वाइफ को। मिथिला के लोग, न तो अपनी बेटी की शादी विवाह-पंचमी के दिन करते हैं और ना ही बेटी को सीता जैसे भाग्य का आशीर्वाद देते हैं।

मिथिला के लोग विष्णु के इस अवतार के प्रति इतने उदासीन रहे कि मिथिला में रामायण 19वीं सदी के उत्तरार्ध में लिखा गया, जब चंदा झा विरचित रामायण को तत्कालीन दरभंगा नरेश लक्ष्मीश्वर सिंह ने छपवाया था। लेकिन इसका कारण धार्मिक कतई नहीं था। उस समय मैथिली को स्कूली शिक्षा का माध्यम बनाने के लिए अभियान चल रहा था। लेकिन मैथिली विरोधी हिंदी की लॉबी ने तर्क दिया कि जिस भाषा (मैथिली) में रामायण जैसे क्लासिक की रचना नहीं की गयी हो, उस भाषा को स्कूली शिक्षा का माध्यम कैसे बनाया जा सकता है।

यह भी कहा जाता है कि कृतिवास ओझा की रचित रामायण मैथिली में ही लिखी गयी थी लेकिन आम लोगों की उदासीनता की वजह से वह रामायण लोगों के चित्त पर नहीं चढ़ पायी फलतः कृतिवास बंगाल चले गए। एक समय था कि जब अयोध्या रामाश्रयी संप्रदाय और ऐसे ही अन्य संप्रदायों का आध्यात्मिक केंद्र हुआ करता था लेकिन जब बाबर ने राम मंदिर तोड़ा और दूसरे धर्मांध मुगल शासकों ने धार्मिक उत्पीड़न शुरू किया, तब इन धर्मावलंबियों ने सीता के जन्मस्थल मिथिला का रुख करना शुरू कर दिया। लेकिन राम और उनको पूजने वाले वैष्णव मत को मिथिला ने आत्मा से स्वीकार नहीं किया।

वैष्णव अपने माथे पर तीन लकीरनुमा तिलक लगाते हैं तो आज भी उन्हें मिथिला में उपहास में 111 एक सौ ग्यारह और राम फटाका वाला महात्मा कहा जाता है। वह गले में तुलसी की माला पहनते हैं तो लोग उन्हें उपहास में कंठमलिया बोलते हैं। वैष्णव गुरु जब कभी भी किसी को मत में दीक्षित करते हैं तो उस व्यक्ति के कान में कुछ मंत्र पढ़ते हैं। और मिथिला में उन वैष्णव गुरुओं को कनफुसकी बाबा बोलते हैं। कभी कोई मैथिल हुआ करते थे जो शायद राम के प्रति अपने आशक्ति की वजह से विष्णुपुरी नाम से जाने जाते थे जब उन्होंने संन्यास ग्रहण करने का विचार किया तो समाज के लोगों ने उन्हें समाज से ही बहिष्कृत कर दिया। योगी जी को अयोध्या में राम मंदिर जरूर बनवा देना चाहिए, काहे कि पता नहीं कब किस दिन कोई चोटाया हुआ मैथिल लव-कुश की तरफ से टाइटल केस कर दे। जो सीता से बियाहे गये, सो भगवान् हुए वरना कहलाते रामचंद्र वल्द दशरथ 
जय सीता माई रहेगा।
पिछले दो दशक की राजनीति ने राम को सांप्रदायिक बना दिया है वरना उस ग्रुप के अहमकों को पता होता कि पहले मुसलमान भी राम-राम कहकर अभिवादन किया करते थे। आपने अपनी हिन्दुत्ववादी आक्रामकता को जय श्री राम में बदल दिया है। 

अनु रॉय की इस पोस्ट पर टिप्पणी करने वाले ज्यादातर लोग अनपढ़ ही लगे  मुझे। साक्षरता के संदर्भ में नहीं, दिमागी परिपक्वता के संदर्भ में। इनमें से ज्यादातर ने रामचरित मानस या रामायण (इसके बारे में छोड़ ही दीजिए, यह संस्कृत में है) पढ़ा नहीं होगा। राम के बारे में इनका अधिकतम ज्ञान रामानंद सागर या बाद के चैनलों पर चलने वाले धार्मिक सीरियलों से आय़ा होगा। 

एक बात तय है, पहली बात कि सीता के चरित्र पर सवाल करने वाला धोबी गंवार नहीं था, गंवार तो वे लोग है जिनका मर्दवादी अहंकार शॉर्ट्स पहनने वाली लड़की के पोस्ट को स्वीकार नहीं कर पाया. आहत हुए इन लोगों में ज्यादातर लोग सुबह सुबह वॉट्सएप पर जीजा-साली के जोक शेयर करने वाले लोग हैं। 

अब ग्रुप के एडमिन ने एक माफीनामा भी पोस्ट किया है। सोशल मीडिया पर बढ़ती इस--मैं असहिष्णुता नहीं कहूंगा--अहमकपने, मूर्खता और नीचता ने एक बात साबित कर दिया है। उसकी मिसाल मैं एक छोटी सी कहानी से दूंगा, जो आपने पहले सुन रखी होगीः
पानी में भींगते-ठिठुरते बंदर को चिड़िया ने देखा तो कहा, बंदर भैया आप भी अपना घर क्यों नहीं बनाते। जवाब में बंदर ने चिड़िया का घोंसला उजाड़ दियाः बड़ी आई, मुझे उपदेश देने वाली. 

फिलहाल सवाल यह है कि सोशल मीडिया पर इन ट्रोल या साइबर बुलीज़ पर कैसे नकेल कसी जाए। अनु रॉय के पास एक विकल्प है कि वह धमकी देने वालों के खिलाफ साइबर क्राइम समेत एफआईआर दर्ज करवाएं, ताकि मुजफ्फरपुर के इन कथित आहत लोगों को दो चार बार मुंबई पुलिस का लाफा पड़े तो भावनाओं के साथ कनपटी भी आहत हो।

बहरहाल, ट्रोल करने वाले इन बंदरों के हाथ में सोशल मीडिया का टूल आ गया है,  और इन्हें अदरक का स्वाद तो बिलकुल पता नहीं। 

3 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (23-05-2017) को
मैया तो पाला करे, रविकर श्रवण कुमार; चर्चामंच 2635
पर भी होगी।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Ravishankar Shrivastava said...

कोढ़ में खाज तब हो जाता है जब ऐसे ज्ञानियों के सामने व्यंग्य में कुछ उलटबांसी जैसा कहा जाए. फिर ये सीधे अर्थ पकड़ लेते हैं और फिर आपके पीछे लट्ठ लेके पड़ जाते हैं.
ईश्वर भी इन्हें सदबुद्धि नहीं दे सकता. हार गया है ईश्वर. और इन्हें तो वो माफ भी नहीं कर सकता.
:)

ABHI said...

शानदार लेखनी,ऐसी ही अभिव्यक्ति की जरूरत है वर्तमान को,बधाई