लेकिन सोचिए जरा. लोग वास्तव में क्या कर रहे हैं? लोग इन दिनों लगभग हर काम के लिए एआई का इस्तेमाल कर रहे हैं. जो लेखक ‘मौलिक सोच के खात्मे’ की चेतावनी देते हैं, वही इससे ईमेल लिखवाते हैं और लेख संपादित कराते हैं. जो पेशेवर विशेषज्ञता के पतन का रोना रोते हैं, वही इससे कानूनी धाराएं और टैक्स से जुड़े सवाल पूछते हैं. यहां एक विरोधाभास है, और इससे भागने के बजाय इस पर ठहरकर सोचने की ज़रूरत है.
यह स्थिति सहज नहीं है. कभी तो इसका भाषा मॉडल ज्ञान-कर्म, लेखन और शायद मानव चिंतन की नींव को ही कमजोर करता लगता है और कभी उसी की मदद से लोग डॉक्टर की पर्ची समझने की कोशिश कर रहे होते हैं। यह तो सचमुच अद्भुत है.
तकनीकी डर कोई नई बात नहीं है. इतिहास में नई तकनीकों को लेकर घबराहट की लंबी और कुछ हद तक हास्यास्पद परंपरा रही है. जब 1830 के दशक में ब्रिटेन में रेल आई, तो डॉक्टरों ने गंभीरता से चेतावनी दी कि मानव शरीर इतनी गति सह नहीं पाएगा. ‘रेलवे मैडनेस’ जैसी बीमारी की खबरें छपने लगीं. एक अमेरिकी यात्री तो कथित पागलों से बचने के लिए रिवॉल्वर लेकर चलता था.
रानी विक्टोरिया ने भी 1842 में पहली रेल यात्रा के बाद लिखा कि उन्हें यह बहुत पसंद आई, लेकिन वे गति से चिंतित थीं. उन्होंने दिन में 40 और रात में 30 मील प्रति घंटा की सीमा तय कर दी.
किताबों के आने पर भी ऐसी ही चिंता हुई थी. 1481 में वेनिस के संपादक हियरोनिमो स्क्वार्सियाफिको ने कहा था कि छपाई अशिक्षित लोगों के हाथों में पड़ गई है और सब कुछ बिगाड़ रही है. उन्होंने लिखा कि किताबों की अधिकता लोगों को ‘कम अध्ययनशील’ बना देती है और यह बात उन्होंने एक छपी हुई किताब में लिखी.
बीसवीं सदी में टेलीविजन को लेकर भी ऐसी ही बातें और गप चली. न्यूटन मिनो ने 1961 में इसे हिंसा और मूर्खता से भरा बताया. बाद में उन्होंने कहा कि वे असल में ‘लोकहित’ की याद दिलाना चाहते थे.
इसका मतलब यह नहीं कि डर बेबुनियाद थे. हर बदलाव में कुछ नुकसान भी हुए. इंग्लैंड के हथकरघा बुनकरों की दुनिया ही खत्म हो गई थी. नुकसान असली थे. असली सवाल यह है कि समाज सुरक्षा-व्यवस्था बनाता है या नहीं. एआई के मामले में तकनीक आ चुकी है, लेकिन नियम नहीं. असली समस्या यही है.
एक और भ्रम यह है कि हम औज़ार और उसके उपयोग को एक मान लेते हैं. चाकू रोटी भी काट सकता है और हत्या भी कर सकता है. दोष चाकू का नहीं, इस्तेमाल करने वाले का होता है. एआई भी ऐसा ही है.
गलत सूचना और प्रचार भी एआई की देन नहीं हैं. 1994 में रवांडा नरसंहार भड़काने वाला रेडियो स्टेशन साधारण तकनीक से चलता था.
एआई ने अमानवीयता नहीं बनाई, बस उसे नया मंच दिया है. इसलिए नियम ज़रूरी हैं. सवाल तकनीकी नहीं, राजनीतिक हैं. लेकिन एक बात जो अक्सर छूट जाती है: एआई जितना नुकसान कर सकता है, उतनी ही मुक्ति भी दे सकता है. अंग्रेज़ी लंबे समय तक ज्ञान के पहरेदार की तरह काम करती रही. अब एआई उस बाधा को तोड़ रहा है. जो लोग इसे ‘अप्रामाणिक’ कहते हैं, वे वही हैं जिनके पास पहले से संसाधन थे. यह वर्गीय तर्क है.
हैलुसिनेशन यानी गलत जानकारी देना एक समस्या है, लेकिन टीवी चैनलों और सरकारों ने यह काम पहले से किया है. कम से कम एआई की गलतियों को पहचाना जा सकता है.
सबसे गंभीर समस्या है एआई का पक्षपात. नौकरी, कर्ज़, जमानत या इलाज में इसका इस्तेमाल भेदभाव को स्थायी बना सकता है. समाधान मशीन को दोष देना नहीं, व्यवस्था सुधारना है.
इससे मुझे एक बड़ा सवाल लगा—अगर हमारी बनाई प्रणालियां पहले ही यह सोचें कि सवाल ही गलत तो नहीं, तो क्या होगा?
यही असली बहस है. डर भी सच है, संभावना भी. सवाल यह है कि हम इसका इस्तेमाल कैसे करते हैं. इतिहास बताता है कि हम गलतियां करते हुए भी आगे बढ़ते हैं. यह लापरवाही का बहाना नहीं, बल्कि थोड़ी जिज्ञासा और कम डर के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा है.
(फ्रंटलाइन के संपादकीय लेख का अनूदित और संपादित अंश)

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