Thursday, October 2, 2008

मेरी गांधीगीरी...


गांधी जी की जय। मेरी भी। गांधी जी का जन्मदिन सारे देश ने मनाया। लोगों ने भाषण दिए। मेरी मां भी मेरा जन्मदिन मनाती है। खीर और गाजर का हलवा हर हिंदी फिल्म के नायक की तरह मुझे भी पसंद है, सो वह बना देती है। कहती है, निठल्ले ठूंस ले। मैं कहता हूं कि अम्मां, अब मैं निठल्ला नहीं ठहरा॥ काम करता हूं। लेकिन दूसरों की तरह मेरी मां भी मेरे काम को अहमियत नहीं देती। बहरहाल, मेरी गांधीगीरी वहीं से शुरु होती है। मैं सारे का सारा मयगाली के, खा जाता हूं। बिना शिकायत किए।


तो गांधी की इस जयंती पर मैं अपनी गांधीगिरी चालू रखने की कसम खाता हूं। मैं कसम खाता हूं कि मैं हमेशा दूसरे चैनलों के भूत-प्रेत, नाग-नागिन, हनुमान के आंसू, भीम की शर्ट-पैंट, नालियों में हिरे-पड़े बच्चों, मियां-बीवी की बेडरूम में होने वाली लड़ाईयों की, झांसी की रानी के पुनर्जन्म की कहानियों पर आधारित आधा घंटा खिंचाऊं घंटा टाइफ प्रोग्रामों की न सिर्फ निंदा करूंगा, बल्कि खिल्ली उड़ाने की हद तक करूंगा। साथ मन ही मन मैं उस चैनल में काम करने की जुगत भिडा़ता रहूंगा। मैं हमेशा उन्हें यह कह कर कोसूंगा कि चूतियों ने पत्रकारिता का तिया-पांचा कर रखा है। लेकिन मैं हर महीने अपना सीवी उनके चैनल हैड को फॉरवर्ड किया करूंगा।


मैं ये भी कसम खाता हूं कि रॉयटर्स से आने वाले फीड में शकीरा और ब्रिटनी स्पियर्स जासी मादक मादाओं के गुदाज़ बदन का, उनके मांसल बदन को, सिर्फ एडिट बे में छिपकर लॉग किया करूंगा, गो कि यह हमारे चैनल में दिखाया नहीं जा सकता। बाद में मैं सीना ठोंक कर कह सकता हूं कि बहन॥चो.. हम उल्टा-सीधा नहीं दिखाते।बाद में जब मैं सीनियर हो जाऊंगा, तो अपने जूनियरों को यह कह कर हड़काऊंगा कि जो कवरेज जो रिपोर्ट हमने की तुम क्या तुम्हारे पुरखे भी नहीं कर सकते। अगर जूनियर २३-२४ साल का हुआ तो उसे यह कहूंगा कि जितनी तुम्हारी उमर नहीं, उतने दिनों से तो मैं मीडिया में कवरेज कर रहा हूं।

मैं कोशिश करूंगा कि सभी मंत्रियों, सभासदो, पार्षदों, सांसदों, विधायकों, उन सबकी पत्नियों, सालों, बहनोईयों के चरण रज का वंदन किया करूं, ताकि वक्त आने पर वो मुझे बाईट दे दिया करें।


मैं ये भी कसम खाता हूं कि कभी किसी प्रकाश झा की तुलना राम गोपाल वर्मा से करके अपनी भद नही पिटवाऊंगा। ताकि दोनों के प्रशंसक मुझसे नाराज़ न हों। और मेरी हर जगह पैठ बनी रहे। आगे से मैं जो भी लिखूंगा, लोगों को खुश करने के लिए लिखूंगा। किसी को नाराज़ नहीं करूंगा। हां, मशहूर होने के लिए रचनाएं ( अच्छी हो या बुरी, कोई फरक नहीं पड़ता) चुरा कर छपवाऊंगा, क्योकि कि पुरस्कार लोगों को मशहूर बनाता है। इसके लिए मैं हिंदी का क्षेत्रीय भाषाई होने का पुरस्कार भी बिना विरोध किए ले लूंगा, क्योंकि मुझे तो मशहूर बनना है।


हां एक और आइडिया है.. सार्वजनिक मंचो पर और नोबेल प्राप्त सर विदिया की तरह बापू की बुराई करके भी मैं मशहूर हो सकता हूं। तो आप मेरे मशहूर होने का इंतज़ार कीजिए। मैं किसी अच्छी रचना की जुगाड़ में हूं।

7 comments:

भवेश झा said...

jo kahunga sach kahunga sach ki siva kuchh nai kahunga, par gandhigiri na re bap mujhse nai hoga, kyonki mai kafi gussalu hu, par gussa kam karne ki koshish karunga dghnyabad....

Shiv Kumar Mishra said...

पूरे देश की गांधीगीरी ऐसी ही है, सर....आप अकेले कहाँ हैं. पूरा देश आपके साथ है.

PREETI BARTHWAL said...

बिलकुल हम सब आपके मशहूर होने का इंतजार करेंगे ताकि आप मशहूर हो और हमारे फसें काम आपके द्वारा बने । गांधी जी की जय.....

neeshoo said...

आपकी गांधीगीरी को पढ़कर दृश्य आंखों के सामने है । आपका यह लेख एक व्यंग है बहुत ही अच्छी लय में लिखा आपने। आपको जब कुछ मिल जाय तो हमारा भी ख्यला रखियेगा । एक बार फिर से आपको बधाई । बहुत सुन्दर

संगीता पुरी said...

आज के युग के अनुरूप ही है ...आपकी यह गांधीगिरी ....क्या पता बापू आज होते तो ऐसी ही गांधीगिरी करते...चिन्ता न करें ...बहुत जल्दी प्रसिद्ध होंगे आप।

डॉ .अनुराग said...

मशहूर तो हो गये है गुरु .अब अगली रचना पेल ही दो.....

कृष्णमुरारी स्वामी said...

सर,
आपकी गांधीगिरी काबिलेतारीफ है। पर एक बात तो सच है कि आप जैसे पत्रकारों कि कमी है। पत्रकारों के नाम पर चुतीयों,दलाल और बनियागिरी करने वालो के लिए यह लेख शायद eye opener का काम करे