Sunday, November 23, 2008

गोवा में तीसरा साल

गोवा में लगातार तीसरे साल आ गया हूे। फिल्म समारोह के लिए । २२ से शुरु हो गया है। लेकिन कोई जगमग नहीं है। खाली-खाली सा मामला। चुकी हुई फिल्मे और चूके हुए फिल्मकार। खीजे हुए स्थानीय लोग और बदहवास बाहरी, यही नज़ारा है अभी पणजी में।

गोवा आने के अनुभव और यहां का अनुभव दोनों बिलकुल विरोधाभासी है..वो एक शेर है ना.. बहुत शोर सुनते थे पहलू में दिल का , जो काटा तो क़तरा-ए-ख़ूं न निकला। उसी तर्ज पर फिल्म समारोह की शोरगुल बहुत सुनते-सुनते उसका उद्घाटन भी हो गया है। लेकिन बड़े दुख से कहना पड़ रहा है कि इस बार मीडिया भी कोई रुचि नहीं ले रहा। और ले भी क्यों, आयोजको ने मीडिया को तरजीह देने या फिर उनके लिए कुछ सुविधाएं जुटाने को कोई तवज्जो नहींदी। औक अंतरराष्ट्रीय होने का ठप्पा लगा ये समारोह किसी भी तरह से उस स्तर का तो नहीं ही है। गोवा आ आयोजको ने इस े पूरी तरह से लोकल बना कर रख दिया है।

तीसरा साल है लगातार जब फिल्म समारोह में आया हूं लेकिन अभी तक के प्रदर्शन से निराश हूँ।

5 comments:

अविनाश वाचस्पति said...

या तो मन को जीतो
या मन जितवाओ मित्र
आप तो प्रसारित करते जाओ
सभी प्रकार के चित्र विचित्र।

अशोक धेरेकर said...

मनजीत भाई
कुछ याद आई
आपसे हुई थी मुलाकात
थोड़ी सी हुई थी बात।

राज भाटिय़ा said...

ठीक कह रहै हो.
धन्यवाद

कृष्ण मुरारी स्वामी said...

मंजीत सर, आप सही कह रहे हैं। किसी भी चैनल पर खबर नहीं है। फिल्म फेयर के उदधाटन में भी उतना जगह नहीं मिला जितना मिलना चाहिए था। पर सर... पत्रकार तो बिना लाग लपेट से अपनी बातों को रखता है। तो फिर बिना निमंत्रण के क्यों नहीं आये। खैर, चलिये आज के मीडिया प्रोफेनल के बीच में कोई पत्रकार तो है,जो बिना किसी भेदभाव के पहिले के तरह ही रात में आधे घंटे का स्लौट दे रहा है।

कृष्ण मुरारी स्वामी said...

मंजीत सर, आप सही कह रहे हैं। किसी भी चैनल पर खबर नहीं है। फिल्म फेयर के उदधाटन में भी उतना जगह नहीं मिला जितना मिलना चाहिए था। पर सर... पत्रकार तो बिना लाग लपेट से अपनी बातों को रखता है। तो फिर बिना निमंत्रण के क्यों नहीं आये। खैर, चलिये आज के मीडिया प्रोफेनल के बीच में कोई पत्रकार तो है,जो बिना किसी भेदभाव के पहिले के तरह ही रात में आधे घंटे का स्लौट दे रहा है।