Monday, April 6, 2009

आपबीती- मेरा चमत्कारी फोन कॉल का इंतजार

आजकल जिंदगी अजीब हो गई है। हमेशा कुछ करने का मन करने लगा है ( ये बयान कहीं और भी सुना था) उसी वक्त कुछ न करने का भी मन करता है। जिंदगी के सूत्र उलझ से गए हैं। सब गड्ड-मड्ड सा लग रहा है।

रात को देर तक नींद नहीं आती... अल्लसुबह जाग जाता हूं, सैट मैक्स पर सुबह सवा तीन बजे से ही क्रिकेट मैच देखने लग जाता हूं। यकीन होता है किसी का मिस कॉल आएगा। पता नहीं किसका...नहीं आता। लगता है कॉल न भी आवे, कोई धड़कता-फड़कता हुआ मेसेज आएगा.. वह भी नहीं आता। दोस्तों ने भुला दिया लगता है।

पटना में अविनाश है, उस नाश की जड़ के मेसेज़ रात ११ बजे आकर ही खत्म हो जाते हैं। इलाहाबाद से प्रशांत मेसेज करता है... लेकिन पता नहीं क्यों मुझे लगता है कि मुझे किसी और ही फोन का इंतजार है।

लेकिन वह जादुई फोन नहीं आता।

मामला कुछ-कुछ ऐसा ही है जैसा बचपन में हम सोचते थे कि चांदनी रात में कोई परी या कोई मणि वाला इच्छाधारी नाग आएगा और हमें हर परेशानी से दूर करने वाला वरदान देकर जाएगा। ऐसा ही कुछ चाह रहा हूं। लेकिन वह चमत्कारी कॉल नहीं ही आता।

भगवान के अस्तित्व पर यकीन कभी पूरी तरह रहा नहीं। संशयवादी किस्म का इंसान हूं, साइंस पढी है लेकिन नास्तिक भी नहीं हूं। मानता हूं कि संसार के ६ अरब लोग किसी न किसी धर्म को मानते हैं। उन ६ अरब लोगों की सामुदायिक समझ अगर भगवान, अल्लाह, गॉड, या ऐसे ही किसी परम सत्ता को पूजती है त मैं क्या ६ अरब लोगों से ज्यादा बुद्दिमान हूं?

फिर लगता है कि भगवान की रेपुटेशन बहुत खराब हो गई है। अगर वो हैं तो उन्हें नहीं होना चाहिए। ऐसे में भगवान से कुछ मांगना जंचता नहीं। लेकिन एक शेर याद आ रहा है--

सुनते हैं कि हर चीज़ मिल जाती है दुआ से 
 एक रोज़ तुम्हें मांग कर देखेंगे खुदा से।

हमारे घर के लोग तो मुझे हाथ से निकल गया मानते हैं। बैष्णव घर का एक ऐसा लड़का जो मांसाहार करता है। भगवान को पूजता नहीं, मंत्र जानता है पर पढ़ता नहीं। (कृपया यह न समझे कि मै अपने आपको रेबेल इस्टेब्लिश करने की कोशिश कर रहा हूं।) लेकिन उन्हें यह पता नहीं कि मै धुआँ भी पीता हूं। पीने में क्या हर्ज है आखिर चीता भी पीता है।

बहरहाल, लिख देने से मगज का भार हलका हो जाता है। सो लिख देता हूं। आज तक किस्मत ऐसी रही कि कोई भी चीज़ समूची नहीं मिली। कोई न कोई हिस्सा बांटने वाला नमूदार हो ही गया। आज कल मेरे एक मित्र हर बात में मुझसे जय माता दी कहते हैं। मुझे बजरंगियों का जय श्री राम याद आता है। लेकिन जय श्री राम जैसा तीखापन और कड़वाहट नहीं उनके जय माता दी में, एक स्वस्ति का भाव रहता है। मैं सुन लेता हूं।

दोस्त में मां जैसा ममत्व है मेरे लिए, कुछ-कुछ प्रेमिका जैसे भाव भी हैं। एकसाथ ही...मैं भाव-विभोर हूं, लेकिन विचार के तौर पर असहमत हूँ। ये असहमति महज धर्म के मामले मे हैं। उनके जय माता दी पर मैं चुप लगा जाता हूं।

धर्म का यह स्तर मुझे पसंद नहीं। श्री सत्यनारायण और वृहस्पति की कथा में जो ज़ोर-जबरदस्ती है उससे भी असहमत हूं। लग रहा है कि मुद्दे से भटक रहा हूं। मैं कह रहा था कि जिंदगी के समीकरण गड़बड़ा गए हैं.. जो चाह रहा हूं वह हो नहीं रहा। जो होना चाहिए वो भी नहीं हो रहा.. बस वही हो रहा है जो मैं चाहता नहीं।

पत्ते बारिश में भींग कर धराशायी हो जा रहे हैं। दिल्ली की सूखी मिट्टी पर पड़ती बूंदे अपेन घर झारखंड जैसी खूशबू पैदा करने लगी हैं। बारिश में खुशबू पहली बार चैन चुरा ले जा रही है, पहले ऐसा नहीं होता था। पहले सिर्फ झारखंड और बिहार से प्यार था, अब मेरे प्यार का दायरा फैल गया है..अब केरल से लेकर महाराष्ट्र, असम, उत्तरांचल तक मुझे एक से लगने लगे हैं। भारत...।। शायद...मुमकिन है इसीलिए बेचैन भी हो रहा हूं।

पिछले दिनों दिल्ली में ही बारिश के दौरान हवा की गैर मामूली गंध से परिचय हुआ था। मैं ने हवा की उस नमी को अपना रुमाल भी दिया था, भींगापन पोंछने को...रुमाल का गीलापन गया नहीं है, उसमे बसी खुशबू भी बरकरार है..चाहता हूं बरकरार रहे जिंदगी..भर माटी की यह सोंधी खुशबू.. जीवन में सूनापन सा आ गया था..कुछ-कुछ भर रहा है।

लेकिन कई ज़ख्म अभी भी हरे हैं। आज की जिंदगी भी ज़ख्म दे रही है, लेकिन इस ज़ख्म के दर्द बड़े मीठे हैं, दुआ कीजिए हमारी जिंदगी में यह ज़ख्म हमारी नींद हमेशा ताजिदंगी हमारी नींद उड़ाता रहे। लेकिन कोई बताए यह मर्ज है क्या??.....

7 comments:

शोभा said...

सुन्दर और सरल भाव अभिव्यक्ति।

अनिल कान्त : said...

ऐ गमें जिंदगी तुझे हुआ क्या है
दिल को राहत पहुँचाने की दावा क्या है .....शायद कहीं सुना था

Science Bloggers Association said...

ये मीठे जख्‍म हमेशा ताजा रहें।

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तस्‍लीम
साइंस ब्‍लॉगर्स असोसिएशन

यती said...

इसका इलाज है !!! आप किसी insurance comapany मे जाइए वाह पार "एजेंट" नामक जंतु होगा ( वैसे यह जंतु रास्ते, रेलवे स्टेशन ,बस स्टॉप पर भी उपलब्द होते है ) उन्हें बस बोल देना की आपको insurance निकालना है लेकिन कृपया ध्यान दे जानकारी लेनेके बाद अपना insurance म़त करना यह बात आपको नुकसान पंहुचा सकती है उन्हें बस बोल देना " मे वापस आऊंगा मे वापस आऊंगा ..... के तुम बिन यह घर सुना सुना है " बस आपकी भावना उनतक पहुच जायेगी उसके बाद अपना दूरध्वनी क्रमांक उस एजेंट के भरोसे छोड़ दो ...... इतना ही करना है मेरे दोस्त .... जागो ग्राहक जागो बॉर्डर पर वो जंतु आपका इंतजार करा रहा होगा ....

संगीता पुरी said...

बहुत सुंदर भावाभिव्‍यक्ति दी है ।

archana sah said...

aap aaj kal likna bhul gaya hai ya phir aapka dhayn bhatak raha hai
sambhal kae yae samay aapkae bhatakna ka nahi hai

archana sah said...

mitra apna samay liknae parna mae lagayie
iimc ka naam dubayie nahi