Tuesday, January 18, 2011

क्या आप गायक बालेश्वर को जानते हैं?



क्या आप भोजपुरी संगीत को सिर्फ अश्लील सिनेमाई गानों और गुड्डू रंगीलाओं और पवन सिंहों की वजह से जानते हैं? अगर आपका उत्तर हां है तो इसका मतलब यह हुआ कि आप हिंदी सिनेमा को सिर्फ डेविड धवन और हिंदी को सिर्फ वेदप्रकाश शर्मा की वजह से जानते हैं। 

भोजपुरी संगीत के पुराने रसिकों को नीक लागे टिकुलिया गोरखपुर के, और बलिया नीचे बलमा हेराइल सजनी जैसे गीत याद होंगे। इन दोनों ही रेकॉर्ड 1979 में ग्रामोफोन कंपनी एचएमवी ने रिलीज किए थे। गायक थे बालेश्वर यादव। 

इन्ही बालेश्वर का पिछले दिनों निधन हो गया। 

बालेश्वर भोजपुरी रंगमंच के पहले शोमैन माने जाते रहे हैं। निहायत ठेठ-गंवई अंदाज़ और अनोखे किस्म की थिरकन और रई रई रई रे के आलाप के साथ बालेश्वर मंच पर छा जाते थे। 

बालेश्वर के निधन के साथ ही भोजपुरी अंचल में एक ऐसे युग का अंत हो गया, जिसके साथ ही एक गायक पहले महानायक और फिर उसी लोकप्रियता के सहारे चुनावी परचम तक लहरा गया। ऐसा उत्तरी भारत में पहली बार हुआ था। 


ठेठ किस्म के आंचलिक कलाकार को स्टारडम मिलने का यह पहला मौका था। 

बालेश्वर का जन्म पुराने आज़मगढ़ और आज के मऊ जिले में हुआ था। बचपन से बिरहा सुनते-सुनते बालेश्वर के भीतर भी एक आशुकवि पैदा हो गया। तुरत-फुरत तुकबंदियां गढ़कर मंच पर सुना देना, वो भी भीतर तक छीलने वाली पंक्तियां...कई बार बालेश्वर को इसकी वजह से नाराजगी का सामना भी करना पड़ा।

बालेश्वर 1965 से 1975 तक लगातार रेडियो के लिए स्वर-परीक्षा देते रहे। लेकिन अमिताभ की ही तरह बालेश्वर भी स्वर परीक्षा में नाकाम होते रहे। हालांकि, रेडियोवालों ने उनकी आवाज की कूवत देर से सही, पहचानी, लेकिन उससे पहले ही सोशलिस्ट नेता बिष्णुदेव गुप्ता इस आवाज में छिपी लोक-अपील का अंदाज भांप गए। 
बालेश्वर का जानाः आज भोजपुरी अचल उदास है


गुप्ता की सभाओं में बालेश्वर गाने लगे। कद्दावर कम्युनिस्ट नेता झारखंडे राय की घोसी से जीत के साथ ही वह लखनऊ पहुंच गए। 

इन्ही दिनों एचएमवी के वही दोनों मशहूर रेकॉर्ड रिलीज हुए जिनकी चर्चा मैं ऊपर कर चुका हूं।

आंचलिकता के अनूठे अंदाज ने बालेश्वर के गीत के पानवाले से लेकर रिक्शेवालों तक की ज़बान पर चढा दिया। 

इसके बाद आवा चली ए धनिया ददरी के मेला से लेकर मतलबी यार न मिले, हिटलर शाही मिले मगर मिलीजुली सरकार न मिले..जैसे बेशुमार लोकप्रिय गीतों ने बालेश्वर को देश ही विदेशों में भी खासा लोकप्रिय बना दिया। 


1995 में मुलायम सिंह यादव की सरकार ने बालेश्वर को यश भारती सम्मान दिया। 

लेकिन मौजूदा दौर के बेढब भोजपुरिया गीतों ने उन्हें आखिरी दिनों मे उदास कर दिया था..उनके जाने से भोजपुरी जगत को एक ऐसी क्षति हुई है जिसे बाजार में खड़ा भोजपुरी संगीत शायद ही भर पाए।


4 comments:

shabd nirantar said...

maine baleshhwar ko suna hai aur unka wo jadui geet nahin bhul sakta.......jab kathal ke kowa tu khaiba to motka mungarwa ka hoi...sachmuch bhades theth aur asli gayak the we.aaj ke vulgar bhojpuri gayakon ki tarah nahin.

नीरज गोस्वामी said...

बालेश्वर जी के बारे में जान कर अच्छा लगा...मैंने तो उनका नाम पहली बार सुना...अपने इस अज्ञान पर शर्मिंदा हूँ...कैसी विचित्र बात है के ऐसे मेधावी कलाकार सिर्फ अपने ही प्रान्त में ही सिमित रह जाते हैं...
नीरज

डॉ .अनुराग said...

Neerj ji se sahamt....unhone jaise mere man ki baat kah di hai

rinku said...

baleshwar ka jaana bhojpuri jagat ko aisi haani hai jiski poorti maujuda daur mein sambhaw nahi dikhti. baleshwar sahi mayano mein bhojpuri k saadhako mein hai.