Monday, December 5, 2011

देवानंद के साथ मेरी मुलाकातः एक यादगार शाम

...देव साहब चले गए। सबको जाना होता है एक दिन। लेकिन हर फिक्र को धुएं में उड़ाने वाले शख्स के ऐसे जाने का ग़ुमां किसी को नहीं था। अभी कुछ ही दिन पहले मैं नीता प्रसाद से बात कर रहा था, इस साल हमने बहुत से बड़े लोगों को खो दिया है। जगजीत सिंह, पंडित भीमसेन जोशी...उस्ताद सुलतान अली खां..हमसे दूर चले गए लोगों की लिस्ट बड़ी लंबी हो गई है। साल 2011 बहुत बुरा गुजरा है।
देव साहब सिर्फ आप हैं, आप  हैं और आप...


देव साब का जाना पेड़ से एक हरी टहनी के टूटने जैसा है। उन जैसी सदाबहार शख्सियत के लिए 88 की उम्र है ही क्या..। सामने इंडियन एक्सप्रैस पड़ा है...कवर पर पहली ही खबर है। सिनेमा के फॉरएवर यंग का जाना....। देव,साब का हंसता, शोख मुस्कुराहट भरा चेहरा। श्वेत-श्याम।

देव साहब की जिंदादिली की बात कईय़ों ने की है। कल शाम यानी रविवार की शाम 8 बजे हमने एक खास कार्यक्रम किया था..रोमांसिंग लिद लाइफ। देव साब जिदंगी के साथ रोमांस ही तो करते रहे। संदीप सिंह ने उनकी जिंदादिली पर उम्दा पैकेज लिखा था। रात को साढे ग्यारह बजे इसे रिपीट टेलिकास्ट किया गया। रितु जी पहले 8 बजे वाले प्रोग्राम में थोड़ा हिचकिचाते हुए लिंक्स पढ़ रही थी, बाद में खुल गईं।

देव साहब की जिंदादिली पर, उनके व्यक्तित्व पर टिप्पणी करने के लिए मैं शायद बहुत जूनियर हूं। लेकिन उनके साथ मुलाकात का जिक्र करता हूं। गोवा में साल 2007..भारत का अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव। फेस्टिवल की रिपोर्टिंग के लिए मैं अकेला गया था दिल्ली से। डीडी की तरफ से।

देव साहब से आधे घंटे के विशेष इंटरव्यू के लिए मैंने उनके सेक्रेटरी से बातें की। शाम को बुलावा आय़ा। जब मैं डीडी की टीम लेकर पहुंचा, एक कैमरामैन, एक लाइटिंग असिस्टेंट  और एक साउंड इंजीनियर...। झुटपुटा होने लगा था। देव साब होटल ताज में रुके थे। सामने समंदर लहरा रहा था। उनने पूछा, लाइटिंग कैसी है। हमारी लाइटिंग बहुत उम्दा नहीं थी, क्योंकि किसी को अंदाजा नहीं था कि वह बाहर बैठ कर इंटरव्यू देंगे।

मेरा चेहरा उतर गया। लेकिन मुझे देखकर देव साब हंस पड़े। बोले, यंगमैन, निराश मत होओ, मै तुम्हे इंटरव्यू दूंगा और जरुर दूंगा। लेकिन पहले चाय पियो। फिर मेरी पूरी टीम को चाय-नाश्ता करवाया। मुझसे ही पूछते रहे कहां से हो, फिल्मों में इंटरेस्ट कैसे हुआ। फिर लाहौर से बॉम्बे की अपनी पूरी जर्नी के बारे में बताया।

मैंने यूं ही पूछ भी लिया, सर आप इस उम्र में भी काम क्यों करते हैं, जबकि आपकी उम्र के लोग रिटायर हो गए। जवाब में वही चिरपरिचित मुस्कान। यंगमैन, मै काम क्यों करता हूं, जो लोग देवानंद नहीं है वो इसे नहीं जान सकते।

फ्लॉप पर फ्लॉप फिल्मों के बाद भी नई फिल्में बनाते जा रहे है। उन्होंने तब बताया कि  जब वो लाहौर से बॉम्बे आए थे तो उनकी जेब में महज 30 रुपये थे। देवसाहब बहुत भावुक होकर बताते रहे कि यही 30 रुपये उनके हैं, बाकी तो सब इसी इंडस्ट्री का है, जिसे अपने योगदान से वापस करने की कोशिश करते है वो।

...और भी बहुत सी अनौपचारिक बातें। गलीउन्होंने मुझे अगली सुबह 7 बजे आने का कहा। उन्हें 8 बजे मडगाव जाना था, नेवी के यहां कुछ कार्यक्रम था। मुझसे पूछा, 7 बजे आ तो जाओगे ना...। मैंने हां कह दिया, लेकिन मुझे खुद पर भरोसा नहीं था।

इतना ही नही अगली सुबह 6 बजे मोहन जी का फोन आया, आप जाग तो गए ना। देवसाब पूछ रहे हैं। मैं अभिभूत हो गया। बहरहाल, मुझे आधे घंटे से ज्यादा का इंटरव्यू उन्होंने दिया..। वो पल मेरे लिए अनमोल हैं, जो मैंने उनके साथ बिताए।

इतना ही नहीं अगले साल जब मै अपने बाकी के सहयोगियों, वीडियो एडिटर मनीष शर्मा, और प्रोडक्शन एक्जीक्यूटिव श्रीकांत तिवारी के साथ गोवा गया, तो उन्होंने न मुझे सिर्फ पहचाना, बल्कि हमने उऩके साथ तस्वीरें खिंचवाने की इच्छा प्रकट की तो बड़ी खुशी से साथ भी आ खड़े हुए।

ये तस्वीरें श्रीकांत के पास है, उनसे कहूंगा कि फेसबुक पर पोस्ट करे।

आखिर, मुझ जैसे न्यूकमर जर्नलिस्ट के लिए उन्होंने इतना प्रेम भाव क्यों दिखाया...जो देवानंद नहीं है, उन्हें इसका अंदाजा भी नहीं होगा। देवसाहब, मैं ताजिंदगी आपको कभी भुला नहीं पाऊगा।

2 comments:

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

आपकी यह मुलाकात पढते पढते न जाने मन क्यों भीग गया ..सच देवानंद देवानंद ही थे

संजय @ मो सम कौन ? said...

वाकई यादगार रही होगी मुलाकात। गज़ब शख्सियत रही है देव साहब की।