Thursday, July 26, 2012

सुनो ! मृगांका:18: इत्ता लंबा सफ़र...?

रिक्शा आगे बढ़ता रहा... अंततः गांव की सरहद आ गई, लोहे की बनी पुलिया.. जिस पर कोलतार कई जगह से चिटक गया था। रिक्शा उसपर चढ़ गया। पीपल के उस पेड़ को पार करते हुए जिसके नीचे पहले कुछ नहीं था, और बचपन में अभिजीत को लगता था कि यहां इस पेड़ पर भूत रहते हैं...वहां हनुमान की मूर्ति जैसा एक पत्थर विराजमान् था। चारों तरफ ईंटों से घेराव कर दिया गया था। रिक्शा, कोलतार की सड़क से होता हुआ उसके घर के पास पहुंचा। 

अभिजीत ने रिक्शेवाले को पैसे दिए और अपने घर के दालान के पास बने टीन के दरवाजे पर लगे ताले को खोलने के लिए चाबी निकालनी चाही। चाबी गुम हो गई थी।

अपना बैग पीठ से उतार भी नहीं पाया था कि उसे हैरान होकर सड़क पर वापस आ जाना पड़ा। रिक्शावाला सड़क के किनारे लघुशंका कर रहा था...क्या हुआ बाबू साहेब?
अरे चाबी गुम हो गई है...। अभिजीत ने लगभग मुस्कुराते हुए ये बात कही।

उसके घर के पास ही पाकड़ का बेहद विशाल पेड़ है। गांव वाले मानते हैं कि उस पेड़ पर बाबा भैरव का निवास है। एक दम मोटा-सा पेड़। जिसको देखते ही अभिजीत को धर्म की अनुभूति हो न हो, एक वैसे प्यार का अनुभव जरूर होता है, जो लोगों को एपने दादाजी से होता होगा।

अभिजीत ने देखा उसी पेड़ से अचानक हजारों जुगनू उड़ गए। अभिजीत मुस्कुराया। कुदरत ने उसका स्वागत ऐसे किया। वाह पाकड़ बाबा। आदमियों ने पहचानने से इनकार कर दिया, लेकिन आप नहीं भूले।

रिक्शेवाले ने उसे अपने घर चलने का प्रस्ताव दिया। अभिजीत के पास उसका प्रस्ताव मानने के सिवा और कोई चारा था भी नहीं। गांव आधी रात बीतते न बीतते गांव में लोग एक नींद सोकर लघुशंका के के लिए जागते हैं। उस अधरतिया में रिक्शावाला मड़र उसे लेकर कहां-कहां घूमता?...सो अजनबी को भी उसकी मेहमाननवाजी मंजूर करनी पड़ी।

सिगरेट के भाईचारे के बाद इतना मामला तो बनता ही था। उधर, अभि भी सोच रहा था कि आज की रात किसी तरह कट जाए तो कल समूचे गांव का चक्कर लगाया जाए। कोई न कोई अपना पहचान वाला तो मिल ही जाएगी। आख़िरकार, उसकी उम्र छत्तीस साल के आसपास है और पचीस साल को एक युग भी मान लें तो ये पूरी अवधि एक युग से भी ज्यादा है।

अभिजीत को लगा कि उसकी पूरी जिंदगी पर एक काला परदा लगा दिया गया है। कुछ इस तरह
कि अंधेरी रात में  वह कोलतार की सड़क पर चल रहा हो और एकमात्र उजाला सामने से आ
रही तेज़ हैडलाईट जैसी रौशनी हो, जिससे उसकी चौंधिया गई हो।
 
 
मड़र का घर। घर क्या था, मड़ई (झोंपड़ी) थी। सड़क से कुछ दूर हटकर गलियों को पारकर उसका घर था। कच्ची नालियां सड़क को आड़े-तिरछे 'बाइसेक्ट' करती थीं। इसका पता तभी चल पाया जब रिक्शे के पहिए नाली में अचानक गहरे धंसे और पैडल के ज़ोर से गली में सूखी ज़मीन पर चढ़ भी गए। इस क्षणांश की प्रक्रिया में अभिजीत के पिछवाड़े बड़ी तेज़ पीड़ा हुई। दरअसल, ऐसी पीड़ाएं और भी तेज़ साबित होती हैं जब बिना बताए, सहसा, बगैर चेतावनी के, यक-ब-यक आती हैं और आपको आश्चर्यचकित, हैरान और दर्द में डूबा छोड़ जाती हैं।

पहिए के ऊधम से पैदा हुआ दर्द इतना तेज़ और मार्मिक था कि अभिजीत के मुंह से कराह-सी निकल पड़ी। लेकिन रिक्शे की खड़खडा़हट में मड़र तक नहीं पहुंची।

 गली के दोनों तरफ़ झोंपड़ियों में घुप्प अंधेरा था। फिर एक घर नज़र आया, जिसमें लालटेन की रौशनी दम तोड़ रही थी। शीशे के चारों तरफ़ कालिमा इस क़दर चाई थी कि अंधेरा मिटने की बजाय और ज़्यादा भयावह लग रहा था। कुल मिलाकर लालटेन मड़र की बचत पर चपत था और बेकार ही केरोसिन पी रहा था। थोड़ी खाली ज़मीन और ऐसी ही जगह जिसके दो तरफ़ टाट लगे थे। यहां टाट का मतलब पटसन नहीं.. बल्कि बांस के फट्टे के फ्रेम में पुआल, मूंज, या अरहर की सूखी टहनियां घुसेड़कर बनाई गई दीवार या प्लाईवुड जैसी चीज़ है। लालटेन भी जल तो खैर क्या रहा था.. आखिरी सांसे ले रहा था।

मड़र की मां अपने पोते-पोतियों को कथरी में लिपटाए थी। मुमकिन है कि आवाज़ सुनते ही मड़र की मां ने अपनी बहू को आवाज़ दी हो। क्योंकि जबतक मड़र उस खलिहाननुमा जगह पर रिक्शे में चेन और ताला बंद करता, गृहथनी (गृहस्थिन) बांस से बने फट्टक (फाटक) पर आकर खड़ी हो गई।

मड़र ने बीवी को आवाज़ लगाई.. पईन..(पानी)। बीवी को शायद उसकी मांग का अंदाज़ा थी.. उसने अल्यूमिनियम का एक लोटा बढ़ा दिया। "...आज घर मे पाहुन आए हैं, एक लोटा पईन औरो लाओ..खाने का जुगाड़ करो..सहरी लोग हैं रोटी जरी लरम (नरम) बनाना.." मड़र ने आदेशात्मक लहजे में बीवी से कहा। पत्नी सिर हिला कर चली गई।

ग़रीब आदमी के घर में पाहुन...उधर बिसेसर मड़र बच्चों को दुलारते हुए पूछ रहा था कि आज उन्होंने दाई (दादी) से कौन-सा किस्सा सुना.। बच्चे बड़े इतराते हुए बता रहे थे, कि आज दाई तिलिया-चवलिया की कहानी सुना रही थी। लड़की ने इतरा के पूछा, सुनाऊं...?

बिसेसर की सहमित पर उसने बताना शुरु किया कि एक सुंदर लड़की की सौतेली मां ने डाह में आकर उसे तिल की कोठी यानी कोठार में बंद कर दिया और अपनी बेटी को इस उम्मीद में कि वह गोरी और सुंदर दिखेगी चावल की कोठी में बंद कर दिया। लेकिन तिल की कोठी वाली लड़की खूब सुंदर निकल गई और तिलोत्तमा नाम से या तिलिया नाम से मशहूर हुई।

चावल को कोठी में बंद लड़की चावल की तरह पीली पड़ गई। तिलिया की शादी एक राजकुमार से हो गई...

अभिजीत को लगा ऐसी कहानियों में हर नायिका राजकुमार से ही क्यों ब्याही जाती है। उधर, मड़र के लड़के ने उसके पैरों से लिपटते हुए अपनी बड़ी बहन की शिकायत की कि दीदिया ने घूर में पकाए गए आलुओं का बड़ा हिस्सा खुद ही साफ़ कर दिया और उसको कम दिया। मड़र ने  उसे दिलासा दिया कि वह अगली सुबह दीदिया को खूब पीटेगा और दिन का खाना भी नहीं देगा।

जब तक दोनों कल (चापाकलः हैंडपंप) पर जाकर नहा आए..मड़र की लड़की वहीं थालियां सजा गई।  अभिजीत ने हाथ-पैर धोते वक्त महसूस किया कि पानी हवा की बनिस्बत ज्यादा ठंढी है।
ओस है... हवा में तरावट है, लोगों के व्यवहार में भी। ठंडे पानी से नहाते वक्त पता नहीं क्यों इस गरमी में भी उसे थरथराहट हो आई थीष। खाने के लिए दोनों एक साथ पटिया यानी चटाई पर
बैठे.. पुआल की रस्सी बांटकर उसे चटाई की शक्ल दी गई थी।

गेहूं की मोटी रोटी...गोभी की सब्जी..एक अलग तरह का स्वाद। थोड़े मौन के बाद सन्नाटा टूटा। मड़र ही बोला," जिंदगी ही बदल गई है सर। पहले हमलोगों को मड़ुए की रोटी और भात भी मुश्किल से ही मिल पाता था। गेहूं की सोहाड़ी (रोटी)दोनों जून खना भी मुश्किल था। सोहाड़ी का चलन इधर से शुरु हुआ है..पहले दोनों टाईम भात खाते थे मोटके चावल उसना भात..मज़दूरी करते थे बाबू लोगों के खेत में...अकाल पड़े तो मालिक भी भूखे..हम भी। हमारी हालत ज्यादा खराब होती। हमलोग दोनों टाईम मंड़सटका (चावल में ज्यादा पानी देकर पकाना और पानी ओसाना नहीं) खाते..खुद्दी (टूटे चावल) भी मुश्किल से मिलता। फिर रिक्शा चलाने चले गए कलकत्ता..। कुछ पैसा जोड़ के आए, तो मजूरी छोड़के खेत बटाई पर लिए। रिक्शा भी चलाते हैं, बटाई का काम भी करते हैं।

खाना खत्म हो गया। अभिजीत की सिगरेट जलती रही, मड़र खैनी ठोककर होंठों में दबाता रहा। थूक-थूक कर लघु सिंचाई परियोजना की तरह उसने आसपास की ज़मीन गीली कर दी।

उधर, खटोले पर केथरी में लिपटी दाई बच्चों के सुलाने में लग गई। सांझे-सकारे बच्चे सो तो जाते हैं, गिल्ली-डंडा और गोली खेल कर लौटे धूल-धूसरित बच्चे लालटेन जलाकर पढ़ने के लिए बैठते तो हैं, लेकिन संभवतः पढ़ना कोई बहुत रुचिकर काम नहीं हैं और यह एक शाश्वत सत्य है। सो, प्रायः हर शहर और गांव के बच्चे संध्याकाल में सो जाते हैं या सोने का उपक्रम करने लग जाते हैं। लेकिन
वही बच्चे जो खाना भी ऊंघते-ऊंघते ही टूंगते हैं खाने के बाद तरोताजा़ हो उठते हैं। खिले हुए गुलाब की तरह..फिर उनके मुख से खरंटन गोल-गोल गप्प निकलते हैं।

मड़र पटिया में एक ओर लुढ़क गया, उसके नाक बजने की आवाज़ आने लगी। चांद की रौशनी पीली पड़ने लगी। अंधेरा बढ़ता जा रहा था। अंधेरा... अभिजीत ने सोचा, ये मेरी जिंदगी के अंधेरे से ज्यादा काला नहीं।

क्रमशः

2 comments:

सौमित्र रॉय said...

अभिजीत से तीन बातें सीखीं। एक तो सिगरेट हमेशा पास रखना चाहिए। पता नहीं किससे भाईचारा करना पड़े। रिक्‍शे में पिछवाड़ा संभालकर बैठें। और सबसे अहम तीसरी बात। मुश्‍किल वक्‍त में बिसेसर मिल जाएं तो समझें ईश्‍वर आपके साथ है।

eha said...

अच्छी है......कहानी आगे नहीं बढ़ रही है......कमी खल रही है....