Sunday, July 29, 2012

एक था टाइगर का असली टाइगर

एक था टाइगर" सलमान खान अभिनीत ये फिल्म आगामी 15 अगस्त को भारत भर मेँ रिलीज की जायेगी,
अगर आपने भी इस फिल्म को देखने का प्लान बनाया है तो पहले आपको ये पोस्ट पढ़नी चाहिये ।
फोटो मेँ दिखाया गया ये शख्स सलमान खान की तरह बहुत मशहूर तो नहीँ है और शायद ही कोई इनके बारे मेँ जानता हो या किसी से सुना हो - इनका नाम था रवीन्द्र कौशिक ये भारत की जासूसी संस्था RAW के भूतपूर्व एजेन्ट थे राजस्थान के श्रीगंगानगर मेँ पले बढ़े रवीन्द्र ने 23 साल की उम्र मेँ ग्रेजुएशन करने के बाद RAW ज्वाइन की थी ,भारत पाकिस्तान और चीन के साथ एक-एक लड़ाई लड़ चुका था और पाकिस्तान भारत के खिलाफ एक और युद्ध की तैयारी कर रहा था।
... जब भारतीय सेना को इसकी भनक लगी उसने RAW के जरिये रवीन्द्र कौशिक को भारतीय जासूस बनाकर पाकिस्तान भेजा, रवीन्द्र ने नाम बदलकर यहाँ के एक कालेज मेँ दाखिला लिया यहाँ से वो कानून की पढ़ाई मेँ एक बार फिर ग्रेजुएट हुए और उर्दू सीखी और बाद पाकिस्तानी सेना मेँ जासूसी के लिये भर्ती हो गये कमाल की बात है पाकिस्तान को कानोँ कान खबर नहीँ हुई कि उसकी सेना मेँ भारत का एक एजेँट है !
 रवीन्द्र ने 30 साल अपने घर से दूर रहकर देश की खातिर खतरनाक परिस्थितियोँ के बीच पाकिस्तानी सेना मेँ बिताए !

 इसकी बताई जानकारियोँ के बलबूते पर भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ हर मोर्चे पर रणनीति तैयार की !
पाकिस्तान तो भारत के खिलाफ कारगिल युद्ध से काफी पहले ही युद्ध छेड़ देता पर रवीन्द्र के रहते ये संभव ना हो पाया केवल एक आदमी ने पाकिस्तान को खोखला कर दिया था !
भारतीय सेना को रवीन्द्र के जरिये रणनीति बनाने का पूरा मौका मिला और पाकिस्तान जिसने कई बार राजस्थान से सटी सीमा पर युद्ध छेड़ने का प्रयास किया उसे मुँह की खानी पड़ी !

ये बात बहुत कम लोगोँ को पता है कि पाकिस्तान के साथ हुई लड़ाईयोँ का असली हीरो रवीन्द्र कौशिक है रवीन्द्र के बताये अनुसार भारतीय सेना के जवानोँ ने अपने अतुल्य साहस का प्रदर्शन करते हुये पहलगाम मेँ घुसपैठ कर चुके 50 से ज्यादा पाकिस्तानी सैनिकोँ को मार गिराया।
 
पर दुर्भाग्य से रवीन्द्र का राज पाकिस्तानी सेना के सामने खुल गया।
 
रवीन्द्र ने किसी तरह भागकर खुद को बचाने के लिये भारत सरकार से अपील की पर सच्चाई सामने आने के बाद तत्कालीन इंदिरा गाँधी सरकार ने उसे भारत वापिस लाने मेँ कोई रुचि नहीँ दिखाई ! अततः उसे पाकिस्तान मेँ ही पकड़ लिया गया और जेल मेँ डाल दिया उस पर तमाम तरह के मुकदमेँ चलाये गये उसको टार्चर किया गया कि वो भारतीय सेना की गुप्त जानकारियाँ बता दे उसे छोड़ देने का लालच भी दिया गया पर उसने मुँह नहीँ खोला और बाद मे जेल मे ही उसकी मौत हो गयी...।


ये सिला मिला रवीन्द्र कौशिक को 30 साल की देशभक्ति का , भारत सरकार ने भारत मेँ मौजूद रवीन्द्र से संबंधित सभी रिकार्ड मिटा दिये और RAW को धमकी दी कि अपना रवीन्द्र के मामले मे अपना मुँह बंद रखे
उसके परिवार को हाशिये मेँ ढकेल दिया गया और भारत का ये सच्चा सपूत गुमनामी के अंधेरे मेँ खो गया।

एक था टाइगर नाम की ये फिल्म रवीन्द्र कौशिक के जीवन पर ही आधारित है जब इस फिल्म का निर्माण हो रहा था तो सरकार के दखल के बाद इसकी स्क्रिप्ट मेँ फेरबदल करके इसकी कहानी मे बदलाव किया गया पर मूल कथा वही है !

 इस देशभक्त को गुमनाम ना होने देँ इस पोस्ट को शेयर एवं टैग करेँ इस पोस्ट को और ज्यादा से ज्यादा लोगोँ को बतायेँ और हाँ जब भी ये फिल्म देखने जायेँ तब इस असली टाइगर को जरूर याद कर लेँ।
 

6 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

देशभक्ति की जीती जागती मिसाल..

rashmi ravija said...

ओह!! जान कर अफ़सोस हुआ ,जिस व्यक्ति ने अपने जीवन के तीस साल अपने देश को समर्पित कर दिए...हमारी सरकार ने उसकी कोई मदद नहीं की.
जासूसों का जीवन तो कठिनाइयों भरा होता ही है...पर करीब से सच्चाई जानकर दिल दहल गया.
आशा है...फिल्म में इस किरदार के साथ न्याय किया गया होगा.

सौमित्र रॉय said...

ऐसे जासूसों को एस्‍पायोनेज की भाषा में एसेट्स कहा जाता है। ये हमेशा से ही सेना के गुमनाम सिपाही रहे हैं। अभी भी कई रवींद्र पाकिस्‍तानी सेना में होंगे। सबसे ज्‍यादा 30 हजार ऐसे एसेट्स अमेरिका के हैं। पर आपको जानकर हैरत होगी कि अमेरिका ऐसे एसेट्स को देश के छंटे हुए गुंडे बदमाशों से चुनता है। 15 से 20 साल के असाइनमेंट पर होते हैं ये। पकड़े जाने पर इनका भी रिकार्ड मिटा दिया जाता है।

eha said...

Informative.... excellent...

Anonymous said...

apne jivan ka balidaan karne wale is jabaaz sipaahi ko humare desh ne andekha kar diya janbuj kar... ishone apne pran nyochawar kar ke humare desh ko khufiya information di.. tab bhi esa suluk kiya gaya . muje bhut dukh hota hai esa sab dekh kar,... netaao ko sipahiyo ke liye esa vyvahaar nahi karna chaiye,,!!

Anonymous said...

खरगोश का संगीत राग रागेश्री पर
आधारित है जो कि खमाज थाट
का सांध्यकालीन राग है, स्वरों में कोमल निशाद और बाकी स्वर शुद्ध लगते हैं, पंचम इसमें वर्जित है, पर
हमने इसमें अंत में पंचम का
प्रयोग भी किया है, जिससे इसमें
राग बागेश्री भी झलकता
है...

हमारी फिल्म का संगीत वेद नायेर ने दिया है.
.. वेद जी को अपने संगीत
कि प्रेरणा जंगल में चिड़ियों कि चहचाहट
से मिलती है...
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