Saturday, April 20, 2013

सुनो! मृगांकाः 30: झल्ला की लब्दा फिरे...


आसमान बादलों से घिरा था, लेकिन धरती प्यासी थी। धरती की प्यास और अभिजीत की प्यास का पैमाना तकरीबन एक सा था।

हवा तेज़ चल रही थी...। काले मेघ, इन्ही हवाओं से टकरा कर दूर चले जाने वाले थे।

अचानक न जाने क्या सूझा अभिजीत को...अंदर जाकर, अपनी ह्विस्की की बोतल उठा लाया। शाम होने में अभी देर थी। दिन अभी ढला नहीं था। अभिजीत को हैरत हो रही थी, अपनी इस दशा पर। गांव में अपने मन का बहुत कुछ किया था उसने।

पहला पैग अंदर गया। अभिजीत का अपने मन पर से नियंत्रण हट गया। ऐसी ही नम हवा चल रही थी, जेएनयू के अहाते में गंगा ढाबा के आसपास कहीं किसी पत्थर पर बैठकर चाय सुड़कते  हुए अभिजीत ने मृगांका को फोन किया था।

याद वहीं।

दूसरा पैग बना, खतम हुआ। याद आया कि एक बार मृगांका ने पूछा था, मेरी कौन सी तस्वीर तुमको अच्छी लगती है....खटाके से अभिजीत ने उसको बांहो में भरते हुए कहा था, जिसमें तुम्हारे ब्रा के स्ट्रेप्स दिखते हैं।

झल्ला...मृगांका चीखी थी। छीः शर्म नहीं आती तुम्हें।
 अभिजीत ने बिना शरमाए कहा था, तुमसे क्या शरमाना।  मृगांका नक़ली ग़ुस्से से दांत पीसती रही और अभिजीत का गाल चुंबनों से भर दिया था...अभिजीत के गालों पर लिपस्टिक के दाग़...और अभिजीत ने बहुत देर तक चेहरा नहीं धोया था।

यादों का विस्तार होता रहा, पांच पैग के बाद, हिचकी आने लगी। गला सूखने लगा। लगा कि ब्लाडर फट जाएगा। वह घर के पीछे खेत की तरफ गया। गांव में उसे उस सुनसान खेत में पेशाब करने में मजा आता था। आसमान में बादल अभी भी थे ही, लेकिन बारिश की संभावना खतम हो गई थी।

कुछ सोचकर वह डगमगाते कदमों से अपनी बाइक की तरफ बढ़ा। कांपते हाथों से बाइक में चाबी डाली...नहीं डली। बेतरह लड़खड़ाते हुए, अभिजीत ने अपनी साइकिल को देखा...। गांव की सड़क पर, डगमगाती साइकिल खजौली की तरफ बढ चली।

कभी मृगांका ने कहा था उससे, मुझे साइकिल की सवारी नहीं कराओगे...। अभिजीत समझ गया था कि मृगांका मज़े ले रही है। मृगांका ने बहुत संजीदगी से कहा था कि उसे साइकिल की सवारी करनी है...लेकिन गांव में लड़कियां साइकिल चलाती हैं, नीतीश कुमार ने हर लड़की को साइकिल दिया है सरकार की तरफ से...लेकिन गांव की बहू चलाएगी?

अभिजीत इसी सोच में चल रहा था। कमला नदी की एक उपधारा उसके गांव से होकर गुजरती है...गरमियो में वह भी सूख जाती है। थोड़ा सा पानी बचा रहता है जिसमें भैंसे लोटमलोट किया करती है। अभिजीत उसी पुल पर से पार कर रहा था।

पूरे गांव की औरतें अभिजीत को इस तरह डगमग साइकिल चलाते हुए देखकर हंस-हंस कर दोहरी हुई जा रही थीं। कुछ ने तो हंसी छिपाने के लिए पल्लू मुंह में ठूंस लिया था...। वो अभिजीत की हालत पर नहीं, उसके साइकिल चलाने के अंदाज़ पर हंस रही थी। वरना अभिजीत तो उनके लिए एक ऐसा प्रतिष्ठित शख्स बन चुका था, जिसने गांव की जाती हुई रौनक को करीब-करीब लौटा दिया था।

गांव का हर विद्यार्थी उसका छात्र बन चुका था। स्कल से लेकर खेती तक, और नई तकनीकों से लेकर पोखरे में जलकुंभी की सफाई तक, पिछले दो महीने में अभिजीत ने मिशन की तरह काम किया था। सही रास्ते पर लेकर आने वाला अभिजीत आज खुद डगमग था।

खजौली पहुंच कर अभिजीत ने सीधे एसटीडी बूथ से प्रशांत का नंबर डायल किया। वह सोचकर कुछ आया था, सोचा उसने वही था...सीधे मृगांका से बात करेगा। लेकिन बूथ में घुसकर हिम्मत नहीं हुई।

हलो
हलो
प्रशांत...
अबे...अभिजीत। कैसा है बे।
ठीक हूं, तू बता
अच्छा है
और...सब
सब क्या, मां दिल्ली आकर मृगांका के घर पर टिक गई हैं। कहती हैं बेटा और बहू को साथ देखकर वापस जाएंगी, मृगांका भी बहुत परेशान है...
ओह...
...और तूने जरूर पी रखी होगी
नहीं
तुम्हारा आवाज से लग रहा है साले...सुन..एक बात  हो गई है
क्या
तुम्हारे पब्लिशर ने तुम्हारी नई किताब पर कुछ उल्टा लिख दिया है, फ्लैप पर।
क्या
लिखा है कि अभिजीत की आखिरी किताब है...
तो
लिखा है इसके बाद नहीं लिखेगा
हा, सही है
अबे नहीं यार। लौट आ।लौट आ ना यार...प्रशांत रो पड़ा। ...और सुन मैं मां को और मृगांका को गांव भेज रहा हूं..अब कोई बात नहीं सुनूंगा। बस

अबे सुन तो..

प्रशांत ने सुनने से पहले फोन रख दिया। अभिजीत का आधा नशा उतर गया...लेकिन मृगांका एक ऐसा नशा थी जो ताउम्र उस पर तारी थी। मानिजुआना से भी गजब का नशा...वह थोड़ा डरा हुआ था, तोड़ा खुश। वह चाहता भी तो ता मृगांका को जीभर देख पाए।








2 comments:

Ajay kumar Banty said...

gazzaaaabbbbbb.....mama....jee...............ye...kisi...ki real life....ki ghatna...h.

सुनीता said...

शब्दों की जादूगरी ऑथर की उँगलियों से अठखेलिया करती हुई बहुत खूबसूरत चित्रण करती है ...