Wednesday, May 1, 2013

आवारेपन का रोज़नामचाः शांति के अधिष्ठाता की जन्मभूमि लुंबिनी

कुशीनगर में हमारे लिए देखने लायक चीज़ें बची नहीं थीं...दिलो-दिमाग़ में बस बुद्ध और उनके संदेश घूम रहे थे। फक्कड़ों का एक अलग संप्रदाय होता है, कबीर, बुद्ध, नानक...और न जाने कितने संत। जिनने कभी नहीं कहा कि धर्म का अर्थ कुछ लोगों को ज्यादा लोगों का शोषण होता है...जिन्होंने तब के धर्मों में सुधार के लिए अपनी बातें रखीं...।

दिन में खेत देखने के शौक़ीनों ने खेत तक घूम आने का प्रस्ताव रखा। हम किसी भी प्रस्ताव का विरोध कत्तई नही करते, जब तक कि वो घूमने-फिरने से जुडा़ हो।

हर किसी को सरसों के खेत में शाहरूख की तरह आड़े खड़े होकर, और हाथ फैलाते हुए तस्वीरें खिंचवाने का शौक़ सवार था। कतार में खड़े फोटो खिंचवाने पर उतारू लोग। गन्ने का स्वाद भी लिया गया। अंगरेजीदां पत्रकारों के लिए इससे बढ़िया पॉवर्टी टूरिज़म और कुछ हो सकता था क्या।

कुशीनगर में हमें शांति के इस जज्बें को सेलिब्रेट करना था, आप जानते ही हैं सेलिब्रेट करने के लिए क्या चाहिए जाड़े के दिनों में..आह, दिनों में नहीं, जाड़े की शाम में।

होटल के मैनेजर ने होटल की विस्तृत छत पर बोन फायर का जुगाड़ किया था। भुने हुए मांसाहार का उत्तम प्रबंध। अग्नि के चारों तरफ मानव वलय...नृत्यरत लोग।

बुद्ध ने कहा होगा, यही जीवन है, जहां हर पल ही आनंद है। जहां उम्मीदें नहीं हों, जहां जमा करने की अभिलाषा न हो, तो दुख नहीं होगा। लोग बड़ी सादगी से नाच रहे थे। गाने जरूर पंजाबी, अंग्रेजी के लिए नृत्य तो आदिम भंगिमा है ना..।

अलसभोर में, बस में भरकर हम निकले तो चारों तरफ कोहरे का साम्राज्य था। बस के केबिन में जाकर बैठ गया। ड्राइवर और कंडक्टर से मेरी गाढ़ी दोस्ती हो गई थी, वो लोग सरेसा खैनी के शौक़ीन थे। इप्सिता मैडम सारे रास्ते कोहरे से ढंके, सफेद चादर में लिपटे हरे-भरे खेतों को कैमरे में क़ैद करती रहीं।

लुंबिनी में, मुख्य मंदिर के सामने

नेपाल भारत सीमा पर, मुझे स्थानीय पकौड़े की खुशबू मिलने लगी थी। थोड़ा ट्रैपिक जाम था, तो हम उतरकर मुरमुरे (मूढ़ी) और पकौड़े खरीदे जिसके साथ मिर्च की लहसुन वाली चटनी थी...अद्भुत स्वाद था।

लुंबिनी पहुंचते-पहुंचते साढे तीन बज गए। हमारे साथ फ्रांस के एक साथी भी थे, जिनके पासपोर्ट-वीजा़ के चक्कर में घंटा भर लग गया था सीमा पर।

बहरहाल, नेपाल के लुंबिनी जाएंगे तो स्थापत्य से लेकर हवा तक में तिब्बती, चीनी या जापानी खुनक मिलती है। भारतीय नहीं।

मंदिर के भीतर वीडियोग्रफी की मनाही थी...मुख्यमंदिर के अंदर तो स्टिल फोटोग्रफी भी मना थी। बहरहाल, हमने कांच से चारों तरफ से बंद एक पत्थर देखा, जिसे देखने के लिए लंबी कतार लगी थी। वह पत्थर, मान्यता है कि इसी पर सिद्धार्थ का जन्म हुआ था।

सिद्धार्थ की मां का नाम माया देवी थी। प्रसूति का वक्त आने पर माया देवी मायके को जाने लगी थीं, तो साल के एक पेड़ के नीचे उन्हें प्रसूति दर्द हुआ और एक पत्थर पर उनने सिद्धार्थ को जन्म दिया था। कुछ ही दिनों में माया देवी की मृत्यु हो गई। शुद्धोधन के पुत्र सिद्धार्थ का पालन-पोषण किया गौतमी ने, जिसकी वजह से सिद्धार्थ को गौतम भी कहा जाता है।

सिंहली अनुश्रुतियों,  खारवेल के अभिलेख, अशोक के सिंहासनारूढ होने की तिथियों की गणना के आदार पर सिद्धार्थ के जन्म की तिथि ईसा के जन्म से 563 साल पहले आंकी गई है।

सिद्धार्थ के जन्म से पहले उनकी मां ने विचित्र सपने देखे थे। पिता शुद्धोदन ने 'आठ' भविष्यवक्ताओं से उनका अर्थ पूछा। सबने कहा कि महामाया को अद्भुत पुत्ररत्न की प्राप्ति होगी। यदि वह घर में रहा तो चक्रवर्ती सम्राट् बनेगा और यदि उसने गृहत्याग किया तो संन्यासी।

संन्यासी भी ऐसा कि अपने ज्ञान के प्रकाश से पूरी दुनिया को चकाचौंध कर देगा।

शुद्धोदन ने सिद्धार्थ को चक्रवर्ती सम्राट बनाना चाहा, उसमें क्षत्रियोचित गुण उत्पन्न करने के लिये समुचित शिक्षा का प्रबंध किया, किंतु सिद्धार्थ सदा किसी चिंता में डूबे दिखाई देते थे। अंत में पिता ने उन्हें विवाह बंधन में बांध दिया।

खैर, यही जगह लुंबिनी है या नहीं इसके बारे में थोड़ा विवाद है, लेकिन कपिलवस्तु से यह करीब 14 किलोमीटर दूर पड़ता है, जैसा ह्वेनसांग ने वर्णित किया है और अशोक का स्तंभलेख भी है, जिसपर लिखा है---'देवानं पियेन पियदशिना लाजिना वीसतिवसाभिसितेन अतन आगाच महीयते हिदबुधेजाते साक्यमुनीति सिलाविगड़भी चाकालापित सिलाथ-भेच उसपापिते-हिद भगवं जातेति लुम्मनिगामे उबलिके कटे अठभागिए च'----इस हिसाब से तो यही जगह लुंबिनी है।

लुंबिनी को नेपाल सरकार ने एक अच्छे पर्यटक स्थल के रूप में विकसित किया है, लेकिन कुछ बुनियादी सुविधाओं की कमी है।

लुंबिनी के उस ऐतिहासिक पत्थर के आसपास डॉलरों, येनों की बरसात थी, बारह-पंद्रह बोरे नोट तो होंगे ही...पता नहीं लोगों ने क्या सोच कर दान दिया था...जो भी सोचकर दिया हो, हमें शाम को वापस लौटने की जल्दी थी। गोरखपुर में महापरिनिर्वाण एक्सप्रैस हमारा इंतजार कर रही थी...हमारी टीम को आगरे के ताजमहल के दीदार करना था।

मुझे ताजमहल में कोई दिलचस्पी नहीं, पहली बार मैं ताजमहल गया। प्रेम के इस वैभवशाली शो-ऑफ को देखकर मुझे ताज्जुब नहीं हुआ। बादशाह था, ताजमहल तो बनाना ही था उसे....मुझे उस अदने से आदमी दशरथ मांझी की याद आई, जिसने फरहाद की तरह अपनी बीवी के लिए पहाड़ का सीना चीर दिया।

प्रेम हो तो दशरथ बाबा जैसा...जो कुछ कर गुजरे वो भी आपने हाथों से। न कि 22 साल में 20 हजार मजदूरों और सत्ता के दम पर। मुमताज को अगर चुनना होता तो शायद बादशाह के हाथों उगाया एक गुलाब ज्यादा पसंद आता...।

खैर. बुद्ध से जुड़े स्थानों का आवारापन की यह समापन किस्त है...अभी कर्नाटक में हूं। यहां की गरम हवा में आवारगी का अपना मजा है।



5 comments:

Ajay kumar said...

मामा जी... आप
अपने विचारों में खोय॓ रहने वाला एक
सीधा और संवेदनशील इन्सान
बहुरंगी जिन्दगी के कुछ रंगों को समेटकर
टूटे-फूटे शब्दों में सहेजन॓ वाला इँसान होllll

Niceee

सुनीता said...

aapki writing power kaabil-e-taarif hai ............u hv narrated all thngs vry gently . personification of this story is supB.

सुनीता said...

.............. waiting " Humpi vritant "

प्रवीण पाण्डेय said...

कर्नाटक में भी इतिहास भरा पड़ा है, उसे भी खोद निकालिये..

सुनीता said...

लिखने का स्टाइल इतना शानदार है ..................जितनी बार पढ़ा ,उतना और पढने का मन किया,

पढ़ते समय खो गए .............. कर्नाटक वृतान्त का बेसब्री से इंतज़ार है .