Thursday, September 11, 2014

हम भारत को कैसा जापान बनाना चाहते है?

जापान यात्रा का जमा-खर्चः

जापान एक देश के तौर पर बहुत विकसित है। भारत ने पूर्व की ओर देखो की नीति कह लीजिए या फिर चीन का मुकाबला करने के लिए जापान से दोस्ती गांठने की कूटनीति कह लीजिए, जापान के साथ अपने रिश्ते की गरमाहट बढ़ाई है।

हमारे देश की अर्थव्यवस्था की आज की स्थिति कुछ वैसी ही है जैसी जापान की आज से चार दशक पहले थी। युद्ध से टूटा हुआ देश, तब कृषि आधारित अर्थव्यवस्था का ही था। रूपया उसका भी उसी तरह कमजोर था, जैसा आजकल हमारा रह रहा है।

दक्षिणपंथी देशभक्तों को शायद रूपया कमजोर होना खल रहा होगा, लेकिन सच तो यह है कि कमजोर रूपया निर्यात को मजबूत करेगा। 

प्रधानमंत्री के तौर पर नरेन्द्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से जो झंडा फहराया, तब उन्होंने कहा था- मेक इन इंडिया। यानी भारत में आकर निर्माण कीजिए। जापान में वहां के व्यवसायियों-उद्योगपतियों को संबोधित करते हुए भी पीएम ने वही कहा था कि भारत में चल कर उत्पादन कीजिए। भारत में उत्पादन की सारी सुविधाएं दी जाएंगी, एकल खिड़की व्यवस्था होगी, और भारत में उत्पादन की लागत कम आएगी। साथ ही, व्यापार की नजर से मध्य-पूर्व और पश्चिमी देशों से भारत नजदीक भी पड़ेगा। परिवहन खर्च कम होगा।

मोदी ने अपनी यात्रा में अगले पांच भारत के लिए निवेश के तौर पर 2.10 लाख करोड़ रूपये जुटा लिए। यह मेरी जापान यात्रा के उस पत्रकारिय अनुभव का निचोड़ भर है, जिसकी रिपोर्टिंग मैं सार्वजनिक प्रसारक के रिपोर्टर होने के नाते करता रहा।

उगते सूरज का देश या मशीनी मानवों की बस्तीः

अब एक वाकया ऐसा, जो कुछ आंखें खोलने वाला, कुछ विचारने पर मजबूर करने वाला रहा। हमें क्योटो से टोकियो के लिए उड़ना था। हमें ओसाका हवाई अड्डे से ही टोकियो के लिए उड़ान भरना था। क्योटो से ओसाका एयरपोर्ट तक  की दूरी कार से तय करनी थी। 

जापानी ड्राइवरों की सुविधा के लिए हर कार में जीपीएस सिस्टम लगा रखा है। इससे वहां की यातायात व्यवस्था में कहीं उनको दिक्कत नहीं होती। 

ड्राइवर बस गंतव्य तक का नाम फीड कर देते हैं, और जीपीएस सिस्टम का स्क्रीन उनको गाइड करता चलता है कि उनको कहां और किसतरह चलना-मुड़ना है।

इस जीपीएस तंत्र ने हमें लगभग धोखा दे ही दिया था। ओसाका एयरपोर्ट के पास फ्लाईओवरों का जाल-सा है। अगल-बगल, ऊपर-नीच तिमंजिला फ्लाईओवर...ड्राइवर की जीपीएस मशीन धोखा दे गई। एक ही रास्ते पर पांचवी बार जाने के बाद हमारे पीटीआई के फोटोग्रफर अतुल यादव ने उनको अच्छी हिन्दी में समझाया और रास्ता भी बताया। 

तब जाकर हम ओसाका एयरपोर्ट तक पहुंच पाए थे। 

यही नहीं, जिस एलीमेंट्री स्कूल में हम गए, वहां बच्चों के पढ़ाने के लिए मशीनों पर निर्भरता बहुत ज्यादा है। कंप्यूटर के जरिए पढ़ाना, अच्छी बात हो सकती है लेकिन इससे दिमाग का विकास कितना हो पाता होगा, मुझे शक है। 

हर बच्चे के हाथ में टैबलेट। कोई सवाल पूछने पर वह सीधे अपनी मशीन का रूख करता था। किसी बड़े से कुछ पूछो तो विनम्रता से अपने फोन या टैब की तरफ देखता था। 

अगर इतना विकास ही असली विकास है, तो शायद यह इंसानों को मशीन में बदलना ही होगा। घर-घर बिजली पहु्ंचाना, सेहत की सुविधाएं पहुंचाना, अच्छी सड़कें तक तो ठीक है, इंसानों की डिजाईन अगर मशीन तय करने लगे, तो मानव प्रजाति के लिए घातक होगा। 

जापान को भी इसके परिणाम जल्द दिखेंगे।



 
 

1 comment:

Alka Kaushik said...

मंजीत, सोचा था तुम्हारे ब्लॉग पर हमेशा की तरह कुछ जज़्बाती लेखन पढ़ने को मिलेगा, लेकिन शायद समय की मारामारी ने तुम्हें इतनी संक्षिप्त टिप्पणी की ही इजाज़त दी। बहरहाल, इसे पढ़कर ये वाला जापान याद आया, डर है कहीं हम भी तो इधर ही नहीं मुड़ गए

http://www.vice.com/the-vice-guide-to-travel/the-japanese-love-industry