Monday, March 23, 2009

आपबीती- जब सर ने कहा, सीताराम भजो


बहुत पहले की बात है मैं तब आठवीं में पढ़ता था। शनिवार का दिन, पहले दो पीरियड पढाई और बाकी के दो पीरियड सांस्कृतिक कार्.क्रम के लिए। पहले दो पीरियड्स से पहले योग या व्यायाम की कक्षा होती थी। ब्रजनारायण झा थे ड्रिल मास्टर। सुबह उठकर ड्रिल बेहद बेकार लगता था। लेकिन पढाई के बाद सांस्कृतिक कार्यक्रम वाले हिस्से में हमारी मौज होती थी। करीब ढाई हज़ार बच्चों का सरकारी स्कूल और उनपर १४ टीचर,स दो क्लर्क थे। इनके जिम्मे भी थी हमारी पढाई।


लेकिन इसकी शिकायत नहीं, क्योंकि किरानी के रुप में काम कर रहे दोनों सर हमारे लिए बहुत कुछ करते थे और हमारे रिटायरमेंट की उम्र तक पहुंच गए मास्टरों से ज्यादा जानते थे। बस पदनाम उनका शिक्षक नहीं था। बहरहाल, दो किरानियों में से एक सुबल चंद्र सिंह थे जिनकी जोरदार आवाज़ कमजोर बच्चों की पैंट गीली कराने के लिए काफी थी।


सांस्कृतिक कार्यक्रम वाले हिस्से में हम लोग-हम पांच लड़के- बिलकुल पीछे बैठकर क्रिस-क्रॉस या ऐसा ही कुछ खेलते थे। या दोपहर छुट्टी के बाद क्रिकेट मैच की योजना में व्यस्त होते। हम पांच गाने-बजाने के मामले में साफ फिसड्डी थे। बहरहाल, एक दिन ऐसे ही दिन, सांस्कृतिक कार्यक्रम के दौरान माइक से मेरे नाम का ऐलान हुआ। बकौल सुबल चंद्र सिंह, मंजीत ठाकुर एक गाना सुनाने वाले थे।
ऐलान मैंने सुना ही नहीं। हम ऐसे एलानों पर ध्यान ही कब देते थे। बाद में, अगल-बगल बैठे साथियों ने बताया कि हमारे नाम की घोषणा हो रही है, तो फिर भारी कदमों से हम उधर चले जो मंच जैसा कुछ था।

माइक के पास पहुंचे, तो सर की कड़कदार आवाज सुनाई दी- गाओ( एक बात और बताना भूल गया- हमारे स्कूल के ठीक पास लड़कियों का भी स्कूल था। उसकी छत से लड़कियां ये सांस्कृतिक आयोजन देखने को लटकी रहती थीं।)


अब तो हमारे लिए दोहरी समस्या हो गई। अपने स्कूल के साथ-साथ लड़कियों के स्कूल में अपमान का भय। अपने स्कूल में तो हम मैनेज कर लेते, लेकिन लड़कियों के सामने हम सर उठा चल पाते क्या अगले दिन से? कितना बड़ा सवाल था..?

बहरहाल, हमने मरियल आवाज़ में सर को जवाब दिया- सर हमें गाना नहीं आता।

सर ने रहम खाकर आदेश दिया- हिंदी की कोई कविता सुना दो।

भाईयों, हिंदी कविता का तो ये हाल था कि परीक्षा की रात हम आठ पंक्तियां याद कर शुद्ध-शुद्ध लिखने का अभ्यास कर लेते थे और अगले दिन एद्जाम हॉल में वोमिट कर आते थे। बस... । आज तो हद हो गई.. कविता सुनानी थी। परीक्षा का वक्त नही था, लेकिन उसे सुनाना था सस्वर। सुर और स्वर के मामले में हम आज तक बेसुरे ही ठहरे। तब तो बात ही कुछ और थी। लड़कियों के सामने, खासकर उनमें से कई हमें अच्छी लगती थीं।

सर, याद नही हैं..। हम मिनमिनाए

सर ने ऊपर से नीचे हमें घूर कर देखा। हम सिहर गए।


हनुमान चालीसा याद है? चलो वही सुनाओ,

हमने देखा मेरे दोस्त गंभीर हो चले हैं। सुबल सर बेतरह कूटकर पीटने के लिए समूचे मधुपुर में मशहूर थे। गार्जियन अपने बच्चों को उनकी छत्रछाया में डालकर निश्चिंत हो लेते थे कि अब वह सही हाथों में हैं। सुबल सर के हाथ बहुत सही थे। बिलकुल सही, उनके हाथों से सखुए की संटी हृदय तक घाव करती। अंग्रेजी में जिसे बट .या हिंदी में जो नितंब हैं, सर के सामने डर से सूख जात थी।


- हम शुरु हुए, श्रीगुरु चरन सरोज रज, निजमन मुकुरी सुधार, बरनौं रघुवर बिमल जस, जो दायक फल चारि......िसके बाद क्या, हलक सूख गया।


बामन का बच्चा होकर हनुमान चालीसा तक याद नहीं.. गदहा.. मूर्ख, उल्लू, पटपट, टमटम टमाटर.. .ये उनकी ऐसी गालियां थी, जिसके बाद छडियों के झंझावात की आशंका होती थीं।
लेकिन भाग्य... छडियों को मौका नहीं मिला.. सर ने आदेश देकर हमारे सभी साथियों को मंच तक बुलाया। पांचों को एक लाईन में बिटाकर कहा, चलो सीताराम-सीताराम ही भजो, जैसा अष्टयाम में भजते हैं।


अगले सात-आठ मिनट तक सीताराम के भजने के बाद हमारी जान छूटी। लोग हंसते रहे। हम कटत रहे। लेकिन हमें सबक मिल गया। अगले ही दिन पांचों दोस्तों ने कॉमन मिनमम प्रोग्राम तैयार किया। सभी ने एक -एक कविता याद कर ली। एक दोस्त ने तीन-चार फिल्मी गीत याद कर लिए। हम सुर में लिद्दड़ हैं, तो पंद्रह-सतरह साफ-सुथरे चुटकुले और एक दोस्त ने इकबाल वाला सारे जहां से अच्छा हिंगोस्तां हमारा पूरा गाना रट लिया।


हमें जलील कर हमारे पर कतरने वाले सर बूढे हो चले हैं। उनकी सेवा के कुछ ही दिन बचे हैं। आजकल बच्चे बताते हैं कि अब सर बिलकुल नहीं मारते। कहते हैं, पेंशन प्लान कर रहा हूं।

7 comments:

pankaj vyas said...

rochak. vaise ram navami pas me hai, sita ram, sita ram bhajo...

अनिल कान्त : said...

मज़ा आ गया भाई तुम्हारा ये किस्सा पढ़कर

मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

mamta said...

मजेदार किस्सा ।

Harkirat Haqeer said...

waah ji waah kya sir the ..? mza aa gya unka kissa sun...sach kahun to mujhe apne Damoder sir yaad aa gaye afim se lal hui badi badi aankhen dekhete hi hmari ghiggi bandh jati....wo kabhi nam se nahi bulate the ...'ladki.' yahi unka sambodhan tha aur rone par aur mar padti...ham to tant bhiche chup chap mar kha lete....!!

आलोक सिंह said...

बहुत बढ़िया , पुरानी यादे ताज़ा करा दी आपने , आप तो खड़े हो गए मंच पर हमें तो जाड़े में पसीने आते थे .

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

भई वाह्! बहुत ही मजेदार किस्सा सुनाया आपने......आभार

राज भाटिय़ा said...

मार तो जरुर पडी होगी, लेकिन हमारी तरह बताने मै शर्मा रहे होगे, हमारे हेडमास्टर साहब थे राम दयाल जी, बोलते बाद मै पहले उन की छडी चलती थी, ओर अगर कभी वो छडी बच्चे को ना लगी ( यानि बच्चे ने अपना बचा कर लिया ) तो दे दनादन...
कितने प्यारे दिन थे वो बचपन के ना जिस के हाथ लग गये वोही पीट देता, बापू, मां ,बडा भाई, ताऊ, चाचा, मोसी चाची
आप ने तो बचपन ही याद दिला दिया.
धन्यवाद