Monday, March 30, 2009

उस शाम बारिश के साथ..

उस शाम मैं अकेला नहीं था, घर शिफ्ट करने की मेहनत के बाद मैं बेहद थक गया था। बेतरह..। शाम पांच बजे नहाने के और चाय पीने के बाद इच्छा हुई कि थोड़ा घूम फिर लिया जाए। इससे पहले घूमने के नाम पर हम मुहल्ले की सड़कों के चक्कर काट लिया करते। पता नहीं मन में क्या विचार आया कि कपड़े डालकर सीधे, मंडी हाउस निकल लिए। क्योंकि उस शाम मैं अकेला नहीं रहना चाहता था।

ऐसे ही घूमते रहे। कई कप चाय सुड़क लिए। क्यों कि उस वक्त तक हम अकेले थे। फोन पर बतिआए, कई सिगरेटें फूंक डालीं, क्यों कि उस वक्त तक अकेले ही घूम रहे थे। कमानी में घुसकर कथक महोत्सव का थोड़ा आनंद लिया, बाहर निकले ही थे कि तभी बारिश ने दस्तक दी। बारिश के आसार पहले से ही नज़र आ रहे थे। लेकिन दिल्ली कोई मुंबई तो है नहीं कि जब-तब बारिश हो।

बारिश फुहारों के रुप में हो रही थी। हम अकेले थे। भगवान दास रोड की ओर निकल लिए, मंडी हाउस के पीछे वाईट हाउस के पास छोटी गोल्ड फ्लेक सुलगा ली। तन-मन गीला होने लगा, तब तक अकेले ही जो थे।

बारिश ने मेरी ही लिखी पुरानी कविता दिल्ली में बारिश की याद ताजा करा दी, हवा भी चलने लगी थी तेज़ तबतक, लेकिन हम तब तक अकले ही थे। थोड़ी ही देर में हवा के साथ खुशबू के झोंका आया, हम अकेले नहीं रहे। बारिश में भीगते हुए खुशबू के साथ लगभग उड़ते-से हम ज्योति-बा फुले मार्ग पर थोड़ी दूर तक गए। सुनसान सड़क पर चलना अच्छा तो लग रहा था, लेकिन ज्यादा दूर नहीं गए क्यों कि अब अकेले नहीं थे।

तन-मन पूरी तरह भींग चुके थे..शर्ट से पानी चू रहा था। सिगरेट बुझ चुकी थी.. मदमस्त खुशबू को नाक में बसाए अम्मा की रसोई तक गए। चाय पी। अकेले जो नहीं थे।

फिर मन हुआ ऐसे ही भींगते हुए, घूमा जाए। थोड़ी देर घूमते हुए, बारिश का मज़ा लिया। एक ऑटोवाले का ऑटो खराब था। कमानी के सामने पहुंचकर उसकी ऑटो में शरण ली, भींगने से बचने की कोशिश की पहली बार क्योंकि अब अकेले नहीं थे। मैं देख रहा था, हवा के उस झोंके को जिसके अलको-पलकों और ठुड्डी से पानी रिस-रिस कर नीचे गिर रहा था, मेरी पैंट पर। मैंने हवा को अपना रुमाल दिया। पोंछने के लिए...हवा में सोंधी खूशबू थी..बरसते पानी की वजह से..वह खुशबू आज भी बसी है मेरे रुमाल में..। क्यों कि मैं अकेला नहीं था।

रात देर हो चुकी थी। पतझड़ के उड़ते पत्तों पर बारिश ने लगाम लगा दी। पत्ते सड़क पर चित्त पड़े थे। फिर से भगवान दास रोड़ होता हुआ मैं वापस घर लौट रहा था, बारिश अभी भी रुकी नहीं थी, मै उड़ रहा था। क्यों कि मैं अब अकेला नहीं थी। बारिश में भीगा हुआ मैं और माटी की शानदार खुशबू... ऐसी बारिश दिल्ली में कभी नहीं देखी। क्यों कि इस बार मैं अकेला नहीं था।

9 comments:

आलोक सिंह said...

बारिश में अकेले सड़क पर घूमना बहुत अच्छा लगता है , और उसपे वो माटी की खुसबू जो दिल को छू जाती है , उसके क्या कहने .
मुझे बारिश में घूमने में बहुत मज़ा आता है .

डॉ .अनुराग said...

उफ़ ये बारिशे इतनी रूमानी क्यों कर होती है ?

संगीता पुरी said...

बिल्‍कुल सच ... बहुत अच्‍छी लगती है बारिश ... पर साथ में बीमार होने का भय भी बना रहता है ... इस बेमौसम बारिश से।

कुमार आलोक said...

भइया अकेले कैसे हो ..विकास सारथी और रीना बोरो भी तो है जनादेश में ..फिर अकेले भींगने क्यूं चल दिये थे ।

शोभा said...

वाह बहुत सुन्दर लिखा है। आपकी कल्पना दिल को भा गई।

यती said...

अच्छा लिखा.काफी emotional कीडे हो आप.जब पढ़ रही थी तब लगा की गुलज़ार जी का लिखा कुछ पढ़ रही हु hehehe

poemsnpuja said...

hamein bhi dilli ki baarish yaad aa gayi...behad khoobsoorati se likha hai. aise barsatein honi chahiye jindagi me kabhi kabhi.

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बारिश का मौसम यूँ ही गजब ढाता है .सुन्दर अच्छा लिखा है आपने

all india radio said...

manjeet ji kafhi accha likhtae hai aap par hum dua kartae hai kee aapko aapki khusboo jaroor milae lakin aapkae sath vikas sarthi or reena bora hai na tao akaela mat jaya karo