Friday, August 5, 2011

बुंदेलखंड का सच-अंतर्गाथा चौथी किस्त


पिछली पोस्ट से जारी...

देश की प्रतिव्यक्ति आमजदनी से यूपी-बुंदेलखंड की प्रतिव्यक्ति आय तीन गुनी कम है। यह तो सिर्फ आंकड़ा है, जमीनी हकीकत ज्यादा बदतर है

गढा़ गांव से हम निकले तो बारिश ने इलाके की काली चिकनी लसेदार मिट्बुंटी से गठजोड़ कर लिया था। हमारी गाड़ी घुटनों (पहियों ) तक धंस चुकी थी। आसपास के गांववालों ने मदद की। खुद पुष्पेन्द्र भाई भी कपड़े घुटनों तक चढा कर मैदान में कूदे। कार को धकेलते घसीसते हम उसे पक्की सड़क तक ले आए। 


लेकिन इस कसरत में जितना तन थका, उससे ज्यादा मन थका था। वापसी में में सोचता रहा कि आखिर क्या वजह है इस इलाके में बढी हुआ आत्महत्याओं के पीछे। 


बैंक और साहूकारों के कर्जों को इऩ आत्महत्याओं के पीछे मानने की खासी वजहें हैं।

मिसाल के तौर पर, बांदा जिले के खुरहंड गांव के इंद्रपाल तिवारी को अपने बीघे जमीन के लिए ट्रैक्टर की कोई खास जरूरत नहीं थीलेकिन एक ट्रैक्टर एजेंट के दबाव में आकर उन्होंने 2004 में अतर्रा स्थित भारतीय स्टेट बैंक से इसके लिए लाख 88 हजार रुपए कर्ज लिए। फसलों से बीज तक न निकल पाने के कारण उनकी हालत खस्ता थी इसलिए वे उसकी किस्तें नहीं चुका पा रहे थे। 

आखिरकार 2006 में झांसी स्थित मेसर्स सहाय एसोसिएट्स के कुछ लोग तिवारी के पास आए और खुद को बैंक का आदमी बताकर उनका ट्रैक्टर छीन कर ले गए। तिवारी ने कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं की मदद से आरटीआई कानून के तहत बैंक से जानकारी मांगी। पता चला, बैंक ने रिकवरी एजेंसी सहाय एसोसिएट्स के जरिए ट्रैक्टर को तिवारी से लेकर लाख 99 हजार रु में नीलाम कर दिया था।
यह तो एक बानगी भर है...ऐसे कई मामले हैं, जिनमें बैंको का मनमाना रवैया सामने आता है।

बुंदेलखंड के ग्रामीण बैंकों की किसानों पर मौजूदा कुल बकाया रकम 4,370 करोड़ रुपये से ज्यादा ही है। यह 2010 के कुल बकाया रकम 3,613 करोड़ रुपये से 21 फीसदी ज्यादा है।

बांदा जिले में मार्च 2011 तक बैंक की रकम वापस करने में नाकाम रहने वाले कर्जदारों में एक लाख से ज्यादा लोग छोटे और सीमांत किसान हैं, और इन पर बैंकों का 453 करोड़ रुपया बकाया है। बांदा जिले में 31 मार्च 2011 तक खेती के काम के लिए दिए गए कुल बकाया कर्ज की रकम 740 करोड़ से ज्यादा थी।

पड़ोसी जिलों जालौन, ललितपुर, झांसी हमीरपुर, महोबा और चित्रकूट में भी स्थिति इतनी ही बदतर है। जालौन जिले में किसानों पर बैंको का करीब 866 करोड़, झांसी में 776 करोड़, ललितपुर में 645 करोड़, हमीरपुर में 575 करोड़, महोबे में 455 करोड़ और चित्रकूट में 311 करोड़ रुपये बकाया है।

आखिर, बुंदेलखंड की यह हालत कैसे हुई..। लोग बैंको का कर्ज क्यों नहीं चुका पा रहे।

कहते हैं कि प्रतिव्यक्ति आय से इलाके की खुशहाली का पता चलता है। बुंदेलखंड के उत्तर प्रदेश वाले सात जिलों में चित्रकूट जिले में प्रति व्यक्ति आय सिर्फ 9106 रुपये है। जबकि इन सात जिलों में बांदा में यह 14,117 रुपये, जालौन में 16,711 रुपये, महोबा में 15,744 रुपये, हमीरपुर में 15,984 रुपये, ललितपुर में 14,872 रुपये और झांसी में 21,397 रुपये हैं।

जबकि भारत के प्रतिव्यक्ति आय की बात करें तो जिस दौरान के आँकड़े मैंने दिए हैं, उस दौरान यानी 2009-10 में 46, 533 रुपये था। 2011 के फरवरी में देश की प्रतिव्यक्ति आमदनी 54 हजार रुपये के आसपास है। 

लेकिन प्रतिव्यक्ति आय का यह आंकड़ा भी महज एक झलकी भर है। ज़मीनी हक़ीक़त इन आकड़ों को और भी डरावना बनाते हैं...

5 comments:

डॉ .अनुराग said...

ऐसे दुखो से भागने का मन करता है....आँख मीचकर उन्हें झुठलाने का भी.....

shanti deep said...

zamin ka dukh zamini admi ki tarah he bahut sakht hota hai. sookhe aansu rone ko majboor log hansi zaroor bhool gaye hain.

गुस्ताख़ मंजीत said...

डॉक्टर साब, इन दुखों को मन तो जरुर करता है झुठलाने का लेकिन हैं सच। अभी और भी हैं...

Udan Tashtari said...

आप जमीनी हकीकत से रुबरु करा रहे हैं..बहुत भयानक स्थितियाँ हैं....

सुनीता said...

................................मात्र पढने से रुह काँप जा रही है ,आप उस हकीकत से रूबरू होकर आये है , आपकी मनोदशा का अंदाजा ... मात्र महसूस करने में ही पीड़ा हो रही है , ............इतनी भयानक सच्चाई ..... उफ़्फ़