Wednesday, November 9, 2011

भूली-बिसरी चंद यादें

परसों शाम को अचानक पीयूष का फोन आया। फेसबुक, मोबाईल फोन, इंटरनेट ने दुनिया न जाने कितनी बदल दी है। पीयूष से पिछले आठ सालों से बात नहीं हुई थी। बचपन का दोस्त है मेरा। फोन आजकर बरेली में है।

बारहवीं तक विज्ञान पढ़ने के बाद एक तरफ मैं परिवार के मेरे डॉक्टर बनने के ख्वाब के झूले पर हिलकोरे ले रहा था, मेरा मन दूसरी और जा रहा था, वहीं पीयूष ने अपनी मां के सामने बिना लाग लपेट के अपना बात सामने रख दी थी। उसे चित्रकार बनना था। वह बन गया।

लखनऊ चला गया वो। मैं खेती बाड़ी पढ़ने लगा। यह बाद की बात है। उसके फोन ने मुझे अतीत की खिड़की पर खड़ा कर दिया है।

महज 30 की उम्र में स्साला यह अतीत क्यों खड़ा हो जाजा है मेरे सामने..? बचपन की कई चीजें एकसाथ साकार हो जा रही हैं।

उन दिनों जब हम नौजवान थे ( माशा अल्लाह जवान तो हम अब भी हैं, मेरे एक दोस्त ने कहा कि आप अपने लिए एक उम्र स्थिर कर लें, तो ताउम्र उसी उम्र का मिज़ाज बना रहता है, उन्हीं की सलाह पर हमने अपने लिए पहले 22 और बाद में संशोधित कर 26 की उम्र तय कर रखी है) उन दिनों गरमियों की लंबी छुट्टियों के साथ दुर्गा पूजा की छुट्टी भी होती थी, कॉलेज सीधे छठ की छुट्टियों के बाद खुलते थे।

यानी पहले 30- दिन की गरमी की छुट्टी फिर एक महीने क्लास और फिर 40 दिन छुट्टी। इन छुट्टियों का सदुपयोग होता। गरमी की दोपहर मैदान में क्रिकेट खेलने के लिए विकेट तैयार करने में इस्तेमाल में आता।

हमारे झारखंड में ज़मीन काफी कठोर हुआ करती है। तो विकेट बनाने के लिए हम उसे ईटों से घिसा करते थे। उसमें स्टंप्स आसानी से गाड़े नहीं जा सकते थे, हम उस जगह पर कई रावणों (खलनायक नहीं, आगे पढ़े) का इस्तेमाल करते।

स्टंप्स आसानी से गाड़े जा सकें, इसके लिए उस स्थान पर टीम के सदस्य मूत्र विसर्जन किया करते थे। देवघर में शिवगंगा के बारे में मान्यता है कि वह रावण के मूत्र से बना सरोवर है। इस मान्यता का इतना प्रैक्टिकल अप्रोच हम अपनाते थे लेकिन किसी ने हमें पुरस्कृत करने की कोई कोशिश तक नहीं की है। खैर...

मैदान में शीशम के कई पेड़ थे। हम फुनगियों तक चढ़ जाते। गिल्ली डंडा बनाने के लिए उपयुक्त शाखाओं की खोज की जाती। सारी दोपहर गिल्ली डंडे का खेल होता। सूरज थोड़ा तिरछा होता तो क्रिकेट शुरु किया जाता।

शाम को धूल-धूसरित हम घर पहुंचते। उसके बाद हमारे कड़क भाई साब हमारी कस के कुटाई करते। लेकिन उस पिटाई का भी अपना मजा था। मधुपुर बहुत याद आ रहा है।

दिल्ली में गाड़ियों की चिल्लपों के बीच छोटा-सा मधुपुर बहुत याद आ रहा है। दो साल हो गए मधुपुर जा नहीं पाया हूं। पहले मधुपुर का था, दिल्ली आ गया हूं, यहां का होने की कोशिश में कहीं का नहीं रहा..।



4 comments:

Rahul Singh said...

जड़ो से जुड़े, फूल खिलते रहें.

sushma 'आहुति' said...

सार्थक पोस्ट....

दीपक बाबा said...

क्या कहते है, रापचिक....

अंतर्मन said...

पहले का पाता नहीं लेकिन अब मधुपुर और दिल्ली ही नहीं और भी कई जगहों पर आपके चर्चे हैं गुरुदेव ....