Thursday, November 17, 2011

मय सूरज, शबनम साकी हैः कविता

एक शाम,
सूरज मचल गया,
किसी के प्यार में पिघल गया,
पहले लाल हुआ
फिर सुनहरा होकर
गिलास में ढल गया
बन गया
एक जाम
एक शाम।

एक भोर,
अलसाई नींद में
दूबों की नोंक पर
जमा हुई शबनम
पहले ठिठकी ज्यादा
फिर कम
शबनम, गिलास के सूरज से मिल गई
पाकर मुहब्बत
गुलाब-सी खिल गई।
बजने लगे जलतरंग
चहुं ओर
एक भोर।

एक दिन
कड़कती धूप से थके तीन दोस्त
सीढियों पर बैठ
हवा के साथ समझकर मय
सूरज औ शबनम को पी गए
लगा कि जिंदगी जी गए
पर सपनों के सूरज को पचाना
कहां आसान है,
कितना भी पिघल ले,
सूरज बर्फ तो नहीं होता,

मुश्किल है जीना सूरज बिन
एक भी दिन।


6 comments:

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

गहन अभिव्यक्ति

rinku said...

जितनी जटिल है उतनी ही सरल भी है गुरुदेव..... बहुत खूब लिखा है आपने वाह!

ram said...

bhaut khoob,,,,,

अनुपमा पाठक said...

मुश्किल है जीना सूरज बिन
एक भी दिन।
बेहद सुन्दर कविता!

संदीप कुमार सिंह said...

बहुत खूब..क्या कही आपने सर जी...

Fursat Nama said...

एक शाम,
सूरज मचल गया,
किसी के प्यार में पिघल गया,
पहले लाल हुआ
फिर सुनहरा होकर
गिलास में ढल गया...!
आह, अति सुंदर!