Friday, April 6, 2012

जॅतो खाबेन तॅतो मॅजा पाबेन...

हम जब बहुत छोटे थे, हमारे शहर में एक मौलवी साहब हाजमा-चूरन बेचा करते। इंजेक्शन वाली छोटी शीशी में रबर का डॉट लगा होता, अंदर काले रंग का गीला सा पदार्थ।  दोपहर की धूप में जब हम घर के कोनों में दुबके होते, या स्कूली दिनों में टिफिन का वक़्त होता ,तो उनकी जानी-पहचानी आवाज़ सुनाई देती। 

बारह रकॅम जड़ी-बूटी, तेरह रकॅम स्वाद, जॅतो खाबेन तॅतो मॅजा पाबेन...बारह तरह की जड़ी-बूटियां तेरह तरह का स्वाद, जितना खाएंगे उतना मजा पाएंगे। अठन्नी की शीशी खरीद ली जाती...कनिष्ठा उंगली से निकाल कर जब हाजमे का गीला पाउडर खाते, तो तमाम किस्म के स्वाद मुंह में भर आते। 

कभी अज़वाइन, कभी काला नमक, कभी हल्की मिठास...अब गूंगे की तरह उस स्वाद को बताने में खुद को नाकाम पा रहा हूं। 

जिंदगी भी कुछ हाजमे की चूरन सी हो गई है...जॅतो खाबेन तॅतो मॅजा पाबेन...। जितना आगे बढ़ता हूं, उतना इसके स्वाद से परिचित होता जाता हूं। कभी करेले सा, कभी काले नमक सरीखा...कभी मिठास तो कभी गुदगुदा स्वाद जिसके लिए मन के जीभ की तमाम स्वादेन्द्रियां ही नहीं, देह की तमाम ज्ञानेन्द्रियां सक्रिय हो जाती हैं।

जिंदगी है...बताया ना जॅतो खाबेन तॅतो मॅजा पाबेन...। किसी को आप खोजते रहते हैं...खोजते रहते हैं..वह नहीं मिलता। एक दिन अचानक आप पाते हैं कि जिसे आप तमाम दुनिया में खोज कर अधमरे से हो गए आपका वही दोस्त आपका इंतजार कर रहा है। 

रुठना-मनाना, झगड़े...आंखे तरेरना। बिला वजह। आपने कहा, किताब दो, वो बिदक जाएगा। लेकर आया तो था चलो नहीं देता। काहे। मेरी मर्जी। आज भी नहीं और कभी भी नहीं। आपने कहा, वजह तो बताओ, वो कहेगा चल बे, नहीं बताता। अंग्रेजी में जिसे कहते हैं-कीप गेसिंग। आप अंदाजा लगाते रह जाते हैं। 

जिंदगी का रवैया कुछ ऐसा ही है। जॅतो खाबेन तॅतो मॅजा पाबेन...

जिंदगी किसी लड़की की तरह व्यवहार करने लग जाती है। आपने गलती से आनंद बक्षी का गीत गा दिया, मौत महबूबा है वाला। फिर देखिए मजा। जिंदगी कहेगी जा बे मौत के हवाले ही जा। उसकी बड़ी-बड़ी आँखों में खो जा। 

आप विकल्पहीन...न आपके पास कोई जवाब..न कोई हल। जिंदगी का रुठना आपके लिए खुशियों का टोटा ले आेगा।

आपने कहा आप नास्तिक हैं। जिंदगी कहेगी ईश्वर को कोई कैसे नहीं मान सकता। आप कहेंगे, चलो ठीक है...जिंदगी अकड़ेगी, सब कुछ किस्मत से होता है।

वक्त से लड़ते-लड़ते आप इतने दीन हो जाते हैं कि एक चिकने पत्थर  की तरह..कोई पानी की बूंद नहीं टिकती। जिंदगी सवाल पूछेगी, जैसा मैंने सोचा था, जैसा मैंने तुम्हे बनाना चाहा था, जैसी मेरी  उम्मीद थी..तुम वैसे नहीं। जिंदगी से कोई लड़ सका है आज तक ...जॅतो खाबेन तॅतो मॅजा पाबेन...।

पेट खाली है, जिंदगी का हाजमा क्या पचाने के लिए खाया जाए। किसी ने कहा था जिसे आप खोजना चाहते हैं जीवन चाहे तो वो आपको खोज लेगा। भीड़ में से जिंदगी ने मुझे खोज निकाला। लेकिन बैंगन चालीस रुपये किलो, खाने का तेल एक सौ पचीस के, खाने लायक चावल तीस रुपये किलो के ऊपर। जीवन ने हमारे हिस्से टूटा बासमती ही छोड़ा। हमारे इलाके में इसको खुद्दी (टूटे चावल) खाना कहते हैं। 

जिंदगी क्या-क्या रंग दिखाती है। विद्यापति का एक पद है। मैथिली में हैं। हमारे इलाकाई गायक हेमकांत बड़े कारुणिक ढंग से गाते हैं..भोलानाथ कखन हरब दुख मोर  (भोलेनाथ मेरा दुख कब हरोगे) बाद में नागार्जुन जी ने लिखा, बांसअक ओइधि उपारि करै छी जारैन..हमर दिन की नहिं फिरतई ..हे जगतारैन। बांस की जड़ उखाड़कर उसे जलावन बनाकर इस्तेमाल कर रहा हूं...हे जगदंबे मेरे दिन कब बहुरेंगे।

ईश्वर में भरोसा न करने वाले को कीर्तन याद आ रहा है। जिंदगी क्या क्या मजा दिलाती है जॅतो खाबेन तॅतो मॅजा पाबेन...

मजाकों, ठहाको, उल्लासों, आईपीएल, जीतों, विजयों, टीवी की चमक-दमक, सिनेमा के रुपहले परदे...और भी न जाने क्या-क्या। इनके बीच मेरे जीवन का एक पक्ष हाजमे के चूरन की तरह धूसर या शायद काला है। बचपन की कड़वी यादें हैं, जवानी में संघर्ष के दिन हैं...सपने हैं जो धीरे-धीरे मटमैले होते गए...वक्त की बारिश में जिनकी रंगत उतरती गई...संघर्ष के तूफान में जिनके कोने झड़ते गए...

कई बार सोचा कि कोई हो जो इन तूफानों में मेरे साथ, मेरी तरह सोचने के लिए हो। लेकिन जिंदगी ने साथ आने से पहले शर्ते लागू वाला सितारा चस्पां कर दिया। जीवन में शर्ते लागू हैं।

किसी ने कहा था जीवन में किताबों का बड़ा सहारा होता है, जीवन के इस सवाल का किसी किताब में उत्तर नहीं। देश में तमाम किस्म की घटनाएं घट रही है, सेना और सरकार में द्वंद्व है, भूख है, गरीबी है, बेरोजगारी है, मंदी है...पेड न्यूज़ हैं, उड़ीसा से लेकर कश्मीर तक और गुजरात से तमिलनाडु तक अपने-अपने जॅतो खाबेन तॅतो मॅजा पाबेन...का मामला है। 

 इन दुखों के बीच मेरे दुख की क्या गिनती है। 

3 comments:

संजय @ मो सम कौन ? said...

"जॅतो खाबेन तॅतो मॅजा पाबेन..." आज एक नया जुमला सीखा :)

मंजीत, आपको पढ़ना एक अलग तरह का अहसास देता है। लिखने में दिखने मस्तमौला, अंदर से पैनी नजर - वाह।

सञ्जय झा said...

जीवन ने हमारे हिस्से टूटा बासमती ही छोड़ा। हमारे इलाके में इसको खुद्दी(टूटे चावल) खाना कहते हैं।

ek aur kahavat aichh.....khuddi kha
k' ki bhook mitat......

bahut sundar

lamhon ka sawal hai....jawaw khud
waqt dega"........


sadar.

प्रवीण पाण्डेय said...

यह तो शाश्वत सत्य है।