Tuesday, October 30, 2012

सुनो ! मृगांका:22: कौन ठगवा नगरिया लूटल हो

अभिजीत दालान पर लेटा हुआ था। चौकी (तख्त) पर। सर के ऊपर खपरैल की छत थी। सामने सांप की जीभ की तरह सड़क दो हिस्सों में बंटी थी। उसके दालान के आगे, आम का पेड़ था। छांहदार। दालान और सड़क के बीच एक चौड़ा-सा आंगन।

गरमी के मौसम...हवा बिलकुल बंद थी। कुछ माहौल ऐसा था मानो भरी देग खदबदा रही हो। पसीने छूट रहे थे। बिसेसर खजौली गया है। रिक्शा लेकर। अभिजीत की पेट में हल्की जलन अब भी थी।

खाने के बाद मन कर  रहा था, हल्की नींद ले। कई झोंके आए भी। बेचैन मन कभी मुज़फ़्फरनगर घूम आया, कभी फैज़ाबाद, कभी मेरठ में होता तो पल भर बाद ही, खान मार्किट के चक्कर काट रहा होता...कभी साकेत तो कभी कहीं और...।

उसे याद है एक बार वह कभी किसी सिलसिले में गया था, फैज़ाबाद से उसने कॉल किया था मृगांका को। तुम्हारे शहर में हूं...।

फैज़ाबाद....। अयोध्या। अवध। वह खुद मिथिला का था। वाह, इस बार सीता अयोध्या से थी, और राम...? उसे आजीवन ईश्वर से वैर रहा था। नहीं, वो राम नहीं था। फिर भी, परंपरा के हिसाब से, लड़का इसबार मिथिला से था, और कन्या कोसल से।

अभिजीत पेट के बल लेट गया। यह उसका पसंदीदा पोस्चर है।

मृगांका के पूर्वजों के राजमहलनुमा हवेलिया थीं...हवेलीनुमा मकान तो उनके दिल्ली में भी थे। मृगांका ने उसे एक बार अपने घर पर खाने के लिए बुलाया था। दोपहर भर अभिजीत यही तय करता रह गया था कि क्या पहनकर जाए।

आखिरकार, उसके लिए पोशाक प्रशांत ने तय की थी।

अभिजीत को पता था कि मृगांका का परिवार रईस है, और वह कुछ ऐसी लिबास पहनना चाहता था कि उनके बीच ऑड मैन आउट न लगे। हालांकि, इस मामले में थोड़ा अक्खड़ था अभिजीत। लेकिन यह जगह अक्खड़पन दिखाने की नहीं थी। यहां नफ़ासत तो चाहिए थी, लेकिन भड़कीला नहीं होना था वह सब।

अभिजीत के पास एक सूट था जरूर, लेकिन वह सालों पुराना था, और पहने जाने की बाट जोहता हुआ थक थका गया था। आखिरकार, प्रशांत ने सलाह दी। आजमाया हुआ नुस्खा काम आया। एक कलफ़दार सूती कुरते और जींस का बाना धारण किया था अभिजीत ने।

मृगांका का परिवार एक शानदार हवेलीनुमा मकान में रहता था। किसी सिक्योरिटी फर्म के गार्ड ने चेहरे पर बेहद नागवार गुजरने वाले भाव ओढ़ रखे थे। मानो अभिजीत के आने का उसको जरा भी परवाह न हो। लेकिन अभिजीत ने भी उतने ही ठसक  से--कुछ ऐसा जताते हुए कि उसे इस बात का बहुत बुरा लगा है--अपने आने का मकसद बताया।

इसके बाद तो शायद उस सिक्योरिटी गार्ड के पंख लग गए। झटपट दरवाजा खुल गया।

मृगांका ने मुस्कुराते हुए अभिजीत का स्वागत किया। उसकी रंगत दमक रही थी। अभिजीत को भरोसा ही नहीं हो रहा था कि आखिर कोई इतना खूबसूरत हो भी कैसे सकता है।

वाउ, बहुत अच्छे लग रहे हो। मृगांका ने कुरते का छोर पकड़ते हुए कहा था।

हालांकि, वो हमेशा की तरह सलवार-कुरते-दुपट्टे में नहीं थी, और उसके बाल बेतरतीबी से बंधे थे और उसने जिस तरह से टीशर्ट पहनी थी, अभिजीत को नहीं लगा कि इस मौके के लिए कपड़े चुनने को लेकर वह ज्यादा परेशान हुई होगी।

वह हाथ पकड़ कर खींचती हुई अभिजीत को ले जाने लगी, यह कहते हुए वह उसे कुछ दिखाना चाहती है। अभिजीत भी खिंचता हुआ उसके पीछे चला गया। कमरा क्या था, बस किताबें, एक गुलाबी रंग का-जी हां गुलाबी- लैपटॉप, अभिजीत ने गौर से देखा आज मृग ने बहुत गहरे लाल रंग की लिपस्टिक भी लगाई थी। कपड़े सलीके से तह किए हुए थे, कुछ बिखरे भी थे...किताबे ज्यादा थीं...कुछ इसतरह मानों उनकी मृगांका के साथ दोस्ती हो।

अभिजीत को लगा कि यह कमरा जिंदा है, इसमें जिंदगी समाई हो।

अभिजीत ने अचानक एक कॉपी-सी उठा ली। डायरीनुमा कॉपी। मृग हंसने लगी..मत पढ़ो। कुछ कविताएं हैं...मैं दीवानी-सी हो रही हूं आजकल....कविताएं लिखने की जी करता है। पहले कभी नहीं हुआ था ऐसा....

अभि ने कहा, मुबारक हो।

फिर मृगांका अभिजीत को अपने रूफ टैरेस पर ले गई। जहां किसिम-किसम के पौधे थे, तुलसी समेत। तुलसी चौरा पर सांझ का दिया जल रहा था। पौधों में पानी दिया जा चुका था...गमलों की माटी से सोंधी खुशबू आ रही थी।

उसने वहीं पर अभिजीत को अपने पापा-मम्मी से मिलवाया। दीदी भी आई हुई थीं। मृगांका के पिता ने अभिजीत का हाथ थाम कर हौले से हलो कहा। मम्मी ने अभिजीत की तरफ ही देखते हुए मृगांका से कहा-वेरी नाइस।

मृगांका के पिता कामयाब बिजनेसमैन थे। अभिजीत किताबें लिखने वाला लिक्खाड़। लेकिन केमिस्ट्री सेट हो गई थी। मृगांका के पापा भी किताबों के शौकीन थे, जब वो दिल्ली आकर बसे थे तो उनने भी जिंदगी शून्य से शुरु की थी। बातों बातों में मृगांका की बड़ी बहन ने बता दिया कि अभिजीत की सभी प्रकाशित किताबें घर के सबी लोगों ने पढ़ रखी हैं, उसका साप्ताहिक कॉलम भी पापा को पसंद है...और अभिजीत जैसे सेल्फमेड मैन को पापा बहुत पसंद करते हैं।

पापा जी चुपचाप खा रहे थे, मु्स्कुराते हुए।

बड़ी बहन ने ये भी बताया कि अभिजीत के जीवन के बारे में भी सबको सब कुछ पता है...। खाने के बाद निकलते वक्त अभिजीत पापा के कदमों पर झुक गया था...पापा ने भी तकरीबन आलिंगन में भरते हुए उसे सौ का एक नोट दिया था। 'बेटे इतनी ही रकम मेरे पास थी, जब मैं दिल्ली आया था, इसे नेग समझ...'अभिजीत अभिभूत हो गया।

बड़े घरों के दिल हमेशा संकरे नहीं होते। जैसा कि अपनी मार्क्सवादी विचार के तहत अभिजीत सोचा करता था। कहानी की यह शुरुआत तो बड़ी शानदार थी...फिर चूक कहां हुई..।

अभिजीत की नींद खुल गई, आँधी के आसार बन रहे थे...।



...जारी

2 comments:

वन्दना said...

रोचकता बनी हुई है

eha said...

Waah. Secret love story. Kahani me tartamya barkarar hai.. Lajwab