Sunday, November 4, 2012

सुनो ! मृगांका:23 : नैना भीतर आव तू, नैन झांप तोहे लेउं

अब तक आपने पढ़ाः- (अभिजीत गांव में अपने घर में लेटा है। वह अपने तेज बुखार के दौरे से उबरने की कोशिश कर रहा है। सपने में वह पता नहीं किन-किन जगहों के दौर कर आता है। उसे याद आता है कि किस तरह वह मृगांका के हवेलीनुमा घर पर गया था, और उसके माता-पिता से मिला था। उसे याद आता है कि मृगांका के पिता ने उसे अपना भरपूर आशीर्वाद दिया था और मां ने नेह भरा हाथ फिराया था। एक प्रेम कहानी की इससे बेहतर शुरुआत क्या हो सकती थी भला...) अब आगे पढिए...

बड़े घरों के दिल हमेशा संकरे नहीं होते। जैसा कि अपनी मार्क्सवादी विचार के तहत अभिजीत सोचा करता था। कहानी की यह शुरुआत तो बड़ी शानदार थी...फिर चूक कहां हुई..।

अभिजीत की नींद खुल गई, आँधी के आसार बन रहे थे...।


आंधी तो ख़ैर क्या कहें, अभिजीत के लिए यह तूफ़ान से कम न था। उसने मिचमिचाते हुए आंखें खोली...भीतर जाकर चापाकल (हैंडपंप) चलाकर मुंह धोया...पानी बेहद ठंडा था। गांव की यही खासियत उसे बहुत सुकून देती है। जल्दी ही उसने स्टोव पर चाय का पानी चढ़ा दिया।

अभिजीत ने हमेशा, यही कहा था-टी इज़ कूल इन समर एंड वॉर्म इन विंटर।

पतीली में चाय का पानी खौल रहा था। अभिजीत यादों में डूब गया। अभिजीत की यादों का सिलसिला, उसकी यादों का तानाबाना सिर्फ और सिर्फ मृगांका के आसपास बुना हुआ था। एक बार उसने कॉल किया था, मृगांका बातें करते-करते खांस रही थी। अभिजीत ने उसे कहा कि वो चाय पिए, अदरक की या फिर तेजपत्ते की।

मृगांका हंसने लगी। अभिजीत को अपनी भूल मालूम हुई, मृगांका ने बताया था उसे कि वो चाय नहीं पीती। बस कभी कभार पीती है। चाय का पानी खौल ही रहा था। पूरे फ्रेम में महज चाय की पतीली। अभिजीत को उसमें भी मृगांका का ही चेहरा दिखता है।

उसी बातचीत में अभिजीत ने किसी तरह मनाया था मृगांका को कि वो काली मिर्च और घी ले, तो खांसी रुक जाएगी। अभिजीत को लगा कि वो ये बातें, इतनी छोटी बातें, किसी को बताएगा, तो लोग उसे दीवाना कहेंगे।

तभी दरवाजे पर आहट हुई। बिसेसर था।

अरे बिसेसर बाबू आओ
अभिजीत भैया, आपको महंत जी बुलाए हैं, मुखिया जी से मिलवाने के लिए बुला रहे हैं। दुर्गाथान(दुर्गा स्थान) पर।

चलो, पहले चाय पी लेते हैं। पिओगे?
अरे बाबू, आप बनाएंगे चाय
क्यों हम नहीं बना सकते, हमारे हाथ की चाय पियोगे , तो बाकी चाय भूल जाओगे, हम चाय बहुत अच्छा बनाते हैं, ये तो मृग भी कहती है...

कौन मृग बाबू...

अरे कोई नहीं, ऐसे ही...लो चाय पिओ।

थोड़ी देर बाद दोनों दुर्गा स्थान पहुंच चुके थे। अभिजीत के घर से फर्लांग भर दूर है दुर्गाथान। वहां एक स्कूल है, तालाब है, मंदिर है, और चौक पर कुछ दुकानें हैं। मंदिर के अहाते में, बारामदे पर मुखिया जी और महंत जी समेत कई लोगों की चौपाल-सी बैठी थी।

आइए, अभिजीत बाबू। परिचय करा दें आपका, इन सबों के। भाईयों,ये हैं अभिजीत बाबू...हमारे ही गांव के हैं, दिल्ली में रहते हैं...कल ही आए हैं। पारस्परिक अभिवादनों का आदान-प्रदान हुआ।

मुखिया जी ने आवाज़ दी, अरे उगना, पानी पिलाओ बाबू को...।
अभिजीत को यह नाम सुना-सुना सा लगा। उगना ये नाम कहां सुना है? मुखिया जी ने बताया अरे, अभिजीत जी अपने गांव से थोड़ा दूर है ना उगना महादेव का मंदिर। रेलवे का हॉल्ट भी है, भवानीपुर के पास। वहीं सुना होगा...कहानी सुनी है आपने उगना की?

अभिजीत ने इनकार में सिर हिला दिया।

महंत जी ने कहानी सुनानी शुरु कर दी, 'बहुत पहले विद्यापति ठाकुर नाम के बड़े शिवभक्त कवि हुए थे..आपको तो पता ही होगा?' इस बार अभिजीत ने सहमति में सिर हिला दिया।

'विद्यापति को मैथिल कोकिल भी कहते हैं। उनकी पदावलियां हिंदी और मैथिली साहित्य की धरोहर मानी जाती हैं, और उनको जायसी, तुलसी, सूर के बराबर माना जाता है। भगवान शिव को भी विद्यापति से बड़ा प्रेम था। अपने भक्त के साथ रहने के लिए ईश्वर भी धरती पर उतर आए, और चरवाहे के रूप में उनके खेतों में काम करने लगे। खेतों में हल चलाते...विद्यापति की सेवा करते। उधर, विद्यापति शिव तांडव स्त्रोत का पाठ करते, शिव की पूजा करते, मैथिली में रचनाएं रचते, महाराजा के दरबार भी जाते, लेकिन इस बात से बिलकुल अनजान कि उनका चरवाहा भगवान शिव ही हैं। पता है चरवाहे के रूप में रह रहे भगवान का नाम क्या था? '

अभिजीत ने फिर इनकार में सिर हिलाया।

उगना, उगना नाम था शिव का।

अरे उगना पानी लाया रे। मुखिया जी ने जोर से गरज कर आवाज़ लगाई। उगना पानी भरा लोटा लेकर हाजिर हो गया। उफ़, कितना ठंडा और मीठा पानी था। अभिजीत को दिल्ली के जीवन के तमाम आरओ वाले और बोतलबंद मिनरल वॉटर की बोतलो का पानी फीका लगा था।

उसने फिर आवाज़ लगाई, उगना!

उधर, दिल्ली में;

मृगांका अस्पताल में थी, आरएमएल में पता नहीं किसकी झलक देखकर उसे लगा कि प्रशांत है। कल शाम ही ब्लास्ट के फुटेज़ में पता नहीं क्यों उसे अभिजीत का चेहरा नज़र आया था। आज उसे प्रशांत का चेहरा दिख गया। उसने सर झटकना चाहा। लेकिन उसे लगा मेडिकल सुपरिटेंडेंट से पूछ लेने में हर्ज़ ही क्या है।

मेडिकल सुपरिटेंडेट ने बताया कि उसके यहां एक डॉक्टर है तो प्रशांत नाम का, लेकिन वह धमाके के बारे में कुछ बता नहीं पाएगा। मृगांका को इससे को ई मतलब नहीं था। उसने डॉक्टर से कहा कि प्रशांत उसका परिचित है और उसकी बहुत दिनों से उसकी मुलाकात नहीं हो पाई है, उसका मिलना जरूरी है।

पता नहीं क्यों, मृगांका को आभास हो रहा था कि हो न हो वह प्रशांत ही था...और अब गुत्थी का एक सिरा तो पकड़ में आएगा।

सच में वह प्रशांत ही था। उसने एक झलक में ही मृगांका को देख लिया था, उसकी निगाहों से बचने केलिए ही वह किनारे से निकल गया था। वॉर्ड बॉय ने जाकर प्रशांत को बताया कि उसे दासगुप्ता जी याद कर रहे हैं और साथ में एक टीवी में काम करने वाली लड़की भी है।

अब प्रशांत के सामने कोई चारा न था।

मेडिकल सुपरिटेंडेट के केबिन का परदा हटने से पहले तक प्रशांत का दिल ज़ोरो से धड़क रहा था। उसे बिलकुल भी अंदाज़ा नहीं था कि वह मृगांका को क्या जवाब देगा।

परदा हटा। लगा कैमरा लॉन्ग शॉट से सीधे जैप़ ट्रैक होता हुआ प्रशांत के चेहरे पर टिक गया, तकरीबन हवाईयां उड़ती हुईं।

कट टू मृगांका। 

हैरत भरी आंखो का एक्सट्रीम क्लोज अप। सिनेमैटिक साइलेंस। कोई जवाब नहीं, कोई सवाल नहीं। लेकिन मृगांका को रुंधी हुआ आंखों में एक हज़ार सवाल थे। प्रशांत की झुकी हुई निगाहें निरुत्तर थीं।

मौन तोड़ा दासगुप्ता जी ने। अरे मृगांका जी यही है हमारा प्रशांत, दिल का डॉक्टर है। हहहह। चलिए आप लोग बात करिए...हम जरा राउंड लगा कर आते हैं।

दासगुप्ता जी निकल गए। प्रशांत ने बस इतना कहा, घर चल कर बात करें।

चलो। मृगांका ने कहा।

गाड़ी गेट से निकली, फ्रेम से बाहर हो गई। सन्नाटा-सा पसरा रहा।




2 comments:

वन्दना said...

रोचकता बरकरार है

eha said...

कहानी का अंत नजदीक मालूम पड़ता है। वैसे संतुलित चल रही है आपकी कहानी.... बढ़िया.....