Monday, June 27, 2016

योग से किसको दिक्कत है?

योग दिवस बिहार में नहीं मनाया गया। कथित सेकुलर साइड के लोगों को लगता है कि योग हिन्दुओं की विरासत है। योग को सिर्फ हिन्दुओं का मानकर इसके कद को छोटा मानना करना होगा। यह ठीक है कि योग हमारी भारतीय संस्कृति की प्राचीनतम पहचान है, और शायद इसलिए सनातन संस्कृति की कुछ पहचान, योग की पहचान से जुड़ी हैं। यह भी ठीक है कि संसार की पहली पुस्तक ऋग्वेद में कई स्थानों पर यौगिक क्रियाओं का उल्लेख है। खासकर, सनातन धर्म में भी योग की मान्यता है, भगवान शिव को योगिराज माना जाता है, तो वहीं, भगवान कृष्ण ने गीता में योग का उपदेश भी दिया है। महावीर जिनेन्द्र और भगवान बुद्ध ने भी योग की साधना की।

तो जब बौद्ध और जैन धर्मों में योग या इसके किसी स्वरूप का जिक्र है, और इन धर्मों के प्रवर्तकों ने योग अपनाया तो इसको किसी एक धर्म से जोड़ना अच्छा नहीं।

लेकिन यह जानना ज़रूरी है कि आखिर यह योग है क्या। योग के बारे में, महर्षि पतंजलि ने कहा हैः चित्तवृत्ति निरोधः इति योगः।

यानी, चित्त की वृत्तियों को खत्म करना ही, योग है।

योग शब्द का मतलब है जोड़ना, संयोग करना, देह और मन को एक साथ एक ही भावभूमि पर लाना। वास्तव में, योग आध्यात्मिक अनुशासन और और बेहद सूक्ष्म विज्ञान पर आधारित ज्ञान है, जो मन और शरीर के बीच अनुशासन स्थापित करता है।

वैसे भारतीय परंपरा में गहरे उतरी हुए योग की भी विभिन्न शैलियां हैं। इनमें ज्ञानयोग, भक्तियोग, कर्मयोग, पातंजलयोग, कुंडलिनीयोग, हठयोग, ध्यानयोग, मंत्रयोग, लययोग, राजयोग, जैनयोग, और बौद्धयोग जैसी शैलियां शामिल हैं।

लेकिन योग की सामान्य साधना में आम लोग योग का मतलब सिर्फ आसनों से समझते हैं, जबकि आसन तो योग का सिर्फ एक अंग है। योग में, यम, नियम, आसन, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, बंध और मुद्रा जैसी साधनाएं की जाती हैं।

यम यानी जीवन में स्वस्थ रहने के लिए कौन से काम नहीं करने चाहिए, और नियम यानी स्वस्थ रहने के लिए किन नियमों का पालन करना चाहिए। कुर्यात तदासनम् स्थैर्यम् यानी आसन का अभ्यास शरीर और मन को स्थिर बनाने के लिए किया जाता है।

प्राणायाम स्वास और प्रश्वास का सुव्यवस्थित और नियमित अभ्यास है। प्राणायाम का अभ्यास नाक, मुख और शरीर के अन्य छिद्रों और शरीर के आंतरिक और बाहरी मार्गों तक जागरूकता बढ़ाता है।

प्रत्याहार के अभ्यास से व्यक्ति, अपनी इंद्रियों के माध्यम से सांसारिक विषयों का त्यागकर अपने मन और चेतना को केन्द्रीकृत करने की कोशिश करता है।

धारणा का अभ्यास मन के विभिन्न विचारों को एकत्रित करने के लिए किया जाता है, और धारणा की यही अवस्था बाद में ध्यान में बदल जाती है। यही ध्यान चिंतन और एकीकरण की अवस्था आगे चलकर समाधि बन जाती है।

बंध और मुद्राएं प्राणायाम से जुड़ी हैं, और यह उच्च कोटि के यौगिक अभ्यास कहे जाते हैं। यह मुख्यरूप से नियंत्रित श्वसन के साथ विशेष शारीरिक बंधों और मुद्राओं के द्वारा किए जाते हैं।

ध्यान का अभ्यास व्यक्ति को आत्मनिक श्रेष्ठता और उन्नति की ओर ले जाता है और यही योग साधना पद्धति का सार है।

योग सिर्फ कसरत या व्यायाम नहीं है। यह हमारे जीवन को जादुई तरीके से बदल देने की क्षमता रखने वाली जीवन शैली है। यह धर्म से नहीं, आध्यात्मिकता से जोड़ने वाली हमारी विरासत है। यह सिर्फ देह को नहीं, मन को और मानसिकता को भी शुद्ध करने वाली जीवन शैली है।

तभी तो भागवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं-

सिद्दध्यसिद्दध्यो समोभूत्वा समत्वंयोग उच्चते

अर्थात् दुःख-सुख, लाभ-अलाभ, शत्रु-मित्र, शीत और उष्ण आदि द्वन्दों में सर्वत्र समभाव रखना योग है।

तो वहीं ऋग्वेद कहता हैः

ओम संगच्छध्वं, संवदध्वं

सं वो मनांसीजानताम्

देवा भागं यथा पूर्वे

संजानाना उपासते

अर्थात्, हम सभी प्रेम से मिलकर चलें, मिलकर बोलें और सभी ज्ञानी बनें। अपने पूर्वजों की भांति हम सभी कर्तव्यों का पालन करें।

...ऋग्वेद की यह ऋचा, हमें योग के बारे में यही तो बताती है, कि देह और मन ही एकाकार न हो, बल्कि समाज के साथ भी हम एकाकार हों। हम सबका विकास हो सबकी उन्नति हो।

योग के माध्यम से आत्मिक संतुष्टि, शांति और ऊर्जावान चेतना की अनुभूति होती है, जिससे हमारा जीवन तनावमुक्त और तथा हर दिन सकारात्मक ऊर्जा के साथ आगे बढता है।

योग का विकास भारत के विकास के साथ हुआ है इसलिए योग में कुछ बातें भारतीय पुरातन संस्कृति की भी होंगी ही। जिस प्राणायाम में ओम के उच्चारण को लेकर इस विज्ञान को धार्मिक रंग दिया जा रहा है, उसके बारे में यह जानना जरूरी है कि सूफी परंपरा में भी प्राणायाम का अस्तित्व है, और सूफी साधकों ने प्राणायाम को चिल्लह-ए-मा-अकुश कहा है।

चाहे ओम का उच्चारण न करें, चाहें आप सूर्य देवता को प्रणाम न करें, लेकिन योग को विज्ञान की तरह स्वीकार करें। अध्ययन प्रमाणित करते हैं कि योग सेहत के लिए अच्छा है और डॉक्टर के यहां जाने के खर्च को बचाता है तो फिर समस्या क्यों।

योग का हिस्सा यम और नियम भी तो हैं। यम यानी कुछ चीजों का निषेध और नियम मतलब कुछ ऐसी चीजें या आदतें जो हमें करनी चाहिए, तो योग को महज आसनों से जोड़कर मत देखिए।

मंजीत ठाकुर

4 comments:

विकास नैनवाल said...

बहुत सुन्दर लेख। इसके साथ इसमें योग से होने वाले फायदे के विषय में किए गये अनुसंधानों और उनके परिणामों का जिक्र भी होता तो योग की वैज्ञानिक सार्थकता पर प्रकाश डलता।
आपके लेख मैं पढता हूँ और वो मुझे पसन्द आते हैं। एक बात और थी मन में, अगर बुरा न माने तो कहता हूँ। आप अपने ब्लॉग में पोस्ट साझा करने वाले विजेट का भी इस्तेमाल करें तो आपकी पोस्ट सोशल मीडिया में साझा करने में आसानी होगी।

सुशील कुमार जोशी said...

सुन्दर आलेख पर हम जैसे लोग भी हैं जिन्हे दिक्कत होती है :)
आलसी लोगों को होती ही है ।
जब सब लोग राय देते हैं सुबह उठो और योग करो की ।

ब्लॉग बुलेटिन said...

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, " सही उपयोग - ब्लॉग बुलेटिन " , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

Babita Singh said...

योग और भारतीय संस्कृति पर आपका article mind blowing है.

- khayalrakheplus.blogspot.in