Saturday, October 1, 2016

पानी पर गुत्थमगुत्था

पिछले कुछ हफ्तों में कावेरी और तमिलनाडु में कावेरी जल बंटवारे पर काफी घमासान दिखा था। बसों को जलाना अपने देश में विरोध प्रदर्शन का सबसे मुफीद तरीका है, सो बसें जलाईं गईं, सड़को पर टायर जलाए गए और हो-हल्ला हुआ।

इसके पीछे मसला क्या था? असल में, कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच कावेरी नदी के पानी के बंटवारे को लेकर एक समझौता है। समझौते का इतिहास हालांकि बहुत पुराना है लेकिन पिछले दो दशकों में यही हुआ कि जल विवाद को सुलझाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने 1990 में अंतर-राज्य जल विवाद अधिनियम के तहत एक पंचाट का गठन किया। साल 2007 में इस पंचाट ने जल विवाद पर पानी के बंटवारे से संबंधित अपनी आखिरी सिफारिश या फ़ैसला दिया। 2013 में केन्द्र द्वारा इसकी अधिसूचना जारी किए जाने के तीसरे वर्ष ही कर्नाटक के उस इलाके में, जहां से कावेरी अपना जल ग्रहण करती है सूखा पड़ गया।

इस साल कर्नाटक के कोडागू जिला, जहां से कावेरी अपना जल ग्रहण करती है, 33 फीसद कम बरसात हुई। नताजतन, कर्नाटक मे कावेरी के जलाशयों, केआरएस, काबिनी, हारंगी और हेमवती बांधों, में अपनी क्षमता से कम पानी मौजूद था। सामान्य तौर पर इस वक्त यह जलभंडार 216 टीएमसी फुट होता है, जबकि इस साल यह भंडार महज 115 फुट था।

कावेरी जल विवाद निपटारा पंचाट का फैसला था कि सामान्य बारिश वाले वर्ष में, कर्नाटक को तमिलनाडु के लिए 193 टीएमसी फीट पानी छोड़ देना चाहिए। जून में 10 टीएमसी फुट, 34 टीएमसी फुट जुलाई में, 50 टीएमसी फुट अगस्त में, 40 टीएमसी फुट सितंबर में और 22 टीएमसी फुट अक्तूबर में। जब कर्नाटक ने जुलाई और अगस्त में जरूरी पानी नहीं छोड़ा, तब तमिलनाडु ने इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

सुप्रीम कोर्ट ने 5 सितंबर को अपनी सुनवाई कर्नाटक को निर्देश दिया कि वह अगले 10 दिनों तक रोज़ 15 हजार क्यूसेक पानी छोड़ें। कर्नाटक ने इस निर्देश के खिलाफ अपील की, लेकिन तमिलनाडु के लिए पानी भी छोड़ दिया। लेकिन दोनों ही राज्यों में पानी के लिए विरोध-प्रदर्शनों को दौर शुरू हो गया।

वैसे, कावेरी के पानी में कर्नाटक का योगदान 462 टीएमसी फुट का होता है लेकिन उसे 270 टीएमसी फुट के इस्तेमाल करने का हक है। जबकि तमिलनाडु सिर्फ 227 टीएमसी फुट का योगदान करके 419 टीएमसी फुट का इस्तेमाल कर सकता है।

यह अजीब सा विभाजन इसलिए हुआ क्योंकि 1924 में जब कावेरी जल का पहला बंटवारा हुआ, उस वक्त तमिलनाडु कावेरी के 80 फीसद पानी का उपयोग कर रहा था। तमिलनाडु के किसानों को पहले उपयोग करने का फायदा मिला।

बहरहाल, पानी के लिए तीसरा विश्वयुद्ध लड़ा जाएगा इसके बारे में कई विद्वानों ने पहले ही आशंकाएं और भविष्यवाणियां कर रखी हैं। लेकिन इस युद्ध को टालने, या पानी पर झगड़ों को खत्म करने का क्या कोई उपाय नहीं हो सकता?

हो सकता है। मैं हमेशा से पानी के आयात को खत्म या बेहद कम करने के पक्ष में रहा हूं। पूरे भारत में रेगिस्तानी इलाकों को छोड़ दें, तो कोई भी इलाका ऐसा नहीं है जहां पीने या इस्तेमाल के लायक पानी नहीं बरसता हो। यह बात और है कि हम लोग उस बारिश के पानी को रोकते नहीं, उसको बचाकर नहीं रखते र हमारी बारिश बर्षा आधारित ही है, लेकिन बर्षा से कम, बरसात आधारित ज्यादा है।

तमिलनाडु की औसत वार्षिक वर्षा करीब 95 सेमी है तो कर्नाटक की करीब 124 सेमी। इसकी एक वजह है कि तमिलनाडु में दक्षिण-पश्चिमी मॉनसून से बरसात नहीं होती, बल्कि उसके पूर्वी तट पर तब बरसात होती है, जिसे हम मॉनसून की वापसी कहते हैं।

फिर भी, जलछाजन योजनाओं के ज़रिए पानी की बचत की जा सकती है। तालाबों की तमिलनाडु में पुरानी परंपरा रही है, उसको पुनर्जीवित करके और ज्यादा पानी खर्च करने वाली फसलों की जगह कम पानी वाली फसलों का चयन करके पानी की बचत की जा सकती है।

पानी के किफायती इस्तेमाल करके भी पानी के आयात को कम किया जा सकता है। जलछाजन योजना में आसपास के दो सबसे ऊंची जगहों के बीच की जगह को वॉटरशेड एरिया या जलछाजन क्षेत्र कहा जाता है। यह इलाका 50 हेक्टेयर से लेकर 50 हजार हेक्टेयर के बीच के आकार का हो सकता है।

इसमें चैक-डैम, छोटी बंधियां और सड़को के, खेतों के किनारे नाले बनाकर बरसात के पानी को सही जगह रोका जाता है। और वॉटरशेड इलाके में पानी की उपलब्धता के आधार पर बोई जाने वाली फसलों का चयन किया जाता है।

बूंद सिंचाई और स्प्रिंकल सिंचाई के जरिए भी पानी की बचत की जा सकती है।

लेकिन पानी की बचत से अधिक ज़रूरी है कि पानी के लिए खून न बहाया जाए।

दोनों राज्यों के नेताओं को अपने अहंकार को तिलांजलि देकर और बरसात की मकी वाले वर्षों में पानी के बंटवारे का कोई फॉर्मूला निकालेना होगा। पिछले नौ वर्षों से कम मॉनसून के वक्त पानी के बंटवारे का कोई फॉर्मूला नहीं निकाला जा सका है। कावेरी पंचाट ने अपना आखिरी फैसला 5 फरवरी, 2007 को सुनाया था, तब से अब तक कोई सर्वानुमति नहीं हुई है कि मॉनसून खराब रहने पर पानी का बंटवारा कैसे किया जाएगा।

अकाल में मिलकर चलना जरूरी होता है, वरना अकेले पड़ जाने पर नुकसान अधिक होता है, खतरा भी।

मंजीत ठाकुर

1 comment:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि- आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल सोमवार (03-10-2016) के चर्चा मंच "कुछ बातें आज के हालात पर" (चर्चा अंक-2483) पर भी होगी!
महात्मा गान्धी और पं. लालबहादुर शास्त्री की जयन्ती की बधायी।
साथ ही शारदेय नवरात्रों की हार्दिक शुभकामनाएँ।
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'