Wednesday, May 2, 2012

सूरजमुखी की याद में हरे पन्ने


अभी-अभी सुभाष चंद्र बोस जंक्शन गोमोह से ट्रेन पकड़ी है। गोमोह पहले सिर्फ गोमोह था. अब इसके नाम के आगे नेताजी सुभाष का नाम भी है। कारण, नेताजी यहीं से अफ़गानिस्तान के लिए रवाना हुए थे। पुरुषोत्तम एक्सप्रैस हांफती हुई बढ़ रही है। चिलचिलाती धूप के बीच हरियाली का दीदार होता है। पारसनाथ की पहाड़ी गुजरती है। जैनों का बेहद प्रसिद्ध तीर्थ है यहां..।

पारसनाथ का इलाका आजकल लालखंडियों यानी माओवादी आतंकियों या नक्सलियों के गढ़ के रुप में मशहूर हो रहा है। तीर्थयात्रियों की आमद में हालांकि कमी नही आई है लेकिन आने वाले लोग कई बार राहजनी के शिकार होते हैं। आतंक का एक डर उनमें थोडा आ तो गया ही है। ये कमजोरों के लिए लड़ रहे नक्सल आंदोलन का दूसरा चेहरा है।

इस इलाके की वारदातों के बारे में सुनकर मुझे आंदोलन के बदलते स्वरुप पर माताटीला, पश्चिम बंगाल में नक्सलबाड़ी गांव में अपने तजुरबे की याद आई। नक्सलबाड़ी भी अब पहले सा कहां रहा...। वहां भी बदलाव ने पैर पसारे है। बहरहाल, मेरे मन में उमड़-घुमड़ रहे विचारों से बेखबर ट्रेन पटरी पर दौड़ी जा रही है।


कोडरमा की घाटी, लग रहा है, पीछे की ओर दौड़ रही है। हरियाली अपने सबसे उत्तेजक स्वरुप में है। तपती धूप में जोर से चलती हवा, जो फिलहाल लू नहीं है।

पहाड़ी ढालों पर महुआ के पेड़ों ने नए कपड़े पहने लिए है। मुझे नहीं मालूम कि अंग्रेजी के शब्द शेड्स के लिए हिंदी के किन शब्दों का इस्तेमाल होता है। या जो मैं कहना चाहता हूं उनपर हिंदी के शब्दों में विचारों के शेड्स आएंगे या नहीं...।


पर्वतपाद में बेर, अमलतास, आम, आसन, अर्जुन, कटहल, सखुआ, साल और ऐसे ही मॉनसूनी जलवायु वाले पेड़ों की भरमार है। जंगल कही-कहीं बहुत घना तो कहीं एकदम से विरल है। बस्तियां भी हैं..कभी-कभार ट्रेन पहाड़ के गर्भ से यानी सुरंग से होकर गुजरती है। पल भर को अंधेरा छा जाता है।


बोगी में भीड़ है। बोगी चने, चाय, मूंगफली, खाना, बिरयानी पानी की बोतल, खीरे बेचने वालों की आवाज से गुलज़ार है। हरापन आँखो को ताजगी दे रहा है। दिल्ली का हरापन एकरस है। यहां धानी रंग का हरापन है, सुनहरा है, पीला है, हल्का पीला, ललछौंह हरियाली है...सुग्गापंखी रंग है, हरे के ही हल्के और गहरे रंगों में इतने शेड्स हैं कि बस देखते रह जाएं। कोई शातिर कलाकार जिसने प्रयोग के नाम पर इतने शेड रच डाले। कुदरत का करिश्मा है।


बीच-बीच में खेत भी हैं। इन परती खेतों में धान की पिछली फसल की यादें मौजूद हैं। धान के पौधे की खूंटियां अतीत की तरह हैं। ताड़ के पेड़ों के झुंड जो कई किलोमीटर से ट्रेन का पीछा कर रही हैं।


कोडरमा की घाटी अब समतल खेतों में तब्दील हो गई हैं। मिट्टी में मैदानी सोफेस्टिकेशन की जगह आदिवासी सौन्दर्य है। एक दम कच्चापन, कंकड़ मिली खूबसूरती। रंग भी गहरा लाल। इन पेड़ों के बीच बड़ (बरगद) भी है, नीम भी, बेर भी, बांस की झुरमुटें भी। ताड़ लेकिन बहुसंख्यक हैं।


बांस की झुरमुटें यहां की ज्यादातर आबादी की तरह कुपोषण की शिकार हैं। पतली शाखाओं वाली, कम लंबी...पत्तीविहीन। नग्न। बरगद दिकुओ (बाहरी) की तरह हरे-भरे हैं। विशाल। ऐसा हा हाल मवेशियों का भी है। गाय, भैंस बकरियां भी कम मजबूत, कम ऊंची., कम ताकतवर। इनके हिस्से का सारा चारा कोई और खा जाता है, इनकी ताकत किसी और के हाथ में है।


मई शुरु ही हुआ है। लेकिन खेतों में सूरज ने सूखे को सूबेदार की तरह तैनात कर दिया है। घरौंदो की तरह बस्तियों में घर हैं। पॉलीथीन शीट्स और फूस की छतों वाले घर। घरों के आगे गोयठे (उपले) के भंडार हैं। जलावन के लिए गोयठा इस्तेमाल करते हैं। उऩका खाद के रुप में प्रयोग अब भी बेहद कम होता है।


दूर पृष्ठभूमि में नग्न हो चुके बेशरम पहाड़ दिख रहे हैं। जंगल लगाने की कोशिशों में सरकार ने कुछ यूकेलिप्टस लगाए हैं। कुछ वैसे ही जैसे पाकिस्तान ने कुछ आतंकी छोड़ रखे हैं। स्लेटी दिखते पहाड़ और हमारे बीच अब कुछ भी नहीं, एक मैदान के सिवा, जहां की घास जल चुकी है। बीच में एकाध हरे टुकड़े हैं।


गौर से देखना चाहता हूं किसी का चेहरा इन सबके बीच। वही मुस्कुराता चेहरा। जिसे मेरा हर जुस्तजू 'वेरी फनी' लगा करती है। जिसके चेहरे की मुस्कुराहट पर मैं तमाम जिंदगी न्यौछावर कर सकता हूं। हरियाली का हर शेड इसीलिए प्यारा लग रहा है कि मैं उसी का चेहरा हर शेड में देख पा रहा हूं। इस सूखी धरती में मैं सूरजमुखी का फूल क्यों तलाश रहा हूं...छोटू तुम कहां हो?


विचार श्रृंखला टूट रही है। सहयात्री कह रहा है, गया आने वाला है।


5 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

मन की यात्रा तो अधूरी रह गयी, गया जो आ गया।

दीपक बाबा said...

विचारों से लय मिलाती यायावरी

sushma 'आहुति' said...

प्रभावशाली प्रस्तुती....

sushant jha said...

grt...

नीरज गोस्वामी said...

बहुत खूब...वाह

नीरज