Thursday, May 10, 2012

वेन यू आर इन शिट्

आज एक कहानी सुनाने का मन कर रहा है। बहुत शिक्षाप्रद कथा है। नाम है गुस्ताख लेकिन कसम बादलों के पीछे बैठे पत्थर के मूरतों की...कहानी धांसू है।

हुआ यूं कि एक बार एक कबूतर रहा। बहुत मांसल। बहुत मुलायम। फरों वाला। खूबसूरत भी। बहुत दिनों से एक बिल्ली उस पर नजर गड़ाए बैठी थी। बिल्ली की नजर उसे मांस पर थी। उसके मुलायम मांस की सोचते ही बिल्ली के मुंह से लार की अजश्र धारा फूट निकलती। वह कल्पना करती कि इस कबूतर के खूबसूरत फरों को यूं खींचकर अलग कर दूंगी...फिर खाऊंगी।

बिल्ली अपनी ताक में...कबूतर भांप गया।

उस साल दिल्ली में बहुत ठंड  पड़ी थी। इतनी कि आदमी तो खैर अकड़ कर मरे ही, कबूतर तक गिर कर मरने लगे।

तापमान जीरो डिग्री तक...। कबूतर बचा रहा।

लेकन कबूतर की अम्मां कब तक खैर मनाती...एकदा सड़क पर फैले दाने चुगने में कबूतर कुछ व्यस्त था। व्यस्त इसलिए था क्योंकि अब दाने लोगों के पेट की बजाय सड़कों पर पड़े मिलते थे। देश में रामराज्य नहीं आया था. मोहन और मोंटी का राज था।

दाने सड़ा दिए जाते थे। लेकिन दाने-दाने को मोहताज लोगों को नहीं दिए जाते। बाजार में कल्याण का भाव नहीं होता। अस्तु। दाने सड़ रहे थे। सड़े हुए दाने सड़क पर फिंक जाते। फेंक नहीं दिए जाते। सड़े हुए दाने नीलाम होते। बीयर बनाने वाली कंपनियां खरीद ले जातीं। लाने ले जाने में कुछ दाने फिंक जाते। गिर जाते। कबूतरों को चुनने की छूट थी। कबूतर, कबूतर थे आदमी जो नहीं थे।

बहरहाल, कबूतर सड़क पर फैले दाने चुगने में व्यस्त था। पेट भर गया था। लेकिन इस दौरान उस कड़ाके की ठंड से वो अकड़ गया। अकड़कर गिर गया।

बिल्ली आगे बढ़ी। झपट्टा मारने। लेकिन ये क्या...वहां से गुजरती एक गाय ने ऐसे शिट् (गोबर) किया कि कबूतर उससे ढंक गया। बिल्ली के भागों जो छींका टूटने वाला था उसपर गोबर...शिट्।

बिल्ली हताश।

लेकिन कबूतर को गोबर की गरमी मिली। ठंड की अकड़ जाती रही। कबूतर गोबर के भीतर से ही गुनगनाने लगा। उधर से गुजरते एक आदमी ने शिट् से गुनगुनाने की आवाज सुनी तो कबूतर को गोबर से निकाल कर बाहर कर दिया।

गोबर से बाहर निकालना था कि घात लगाई बिल्ली ने कबूतर पर हाथ साफ कर दिया।

वायदे के मुताबिक मुझे आपको बताना है कि आखिर इस किस्से से क्या शिक्षा मिलता हैः

1. आप पर शिट् करने वाला हर कोई आपका दुश्मन नहीं होता
2. आपको शिट् से निकालने वाला हमेशा आपका दोस्त नहीं होता
और,
3. जब आप शिट् में हों गाना-गुनगुनाना अच्छा नहीं, बल्कि नुकसानदेह होता है।

4 comments:

अनूप शुक्ल said...

क्या बात है जी! बड़ी शानदार नैतिक शिक्षा की कहानी है।

डॉ .अनुराग said...

सही है बीडू ! एक बैठक तय रही !

दीपक बाबा said...

ये आधुनिक पंचतंत्र की कहानी बनेगी.

kavyabaan said...

मजा आ गया...
व्यंग्य बाण तीखे हैं ...