Tuesday, November 13, 2012

सुनो ! मृगांका :25: हमारा यार है हम में

मुखिया जी उगना का किस्सा सुनाने लगे। अभिजीत का ध्यान कहीं और ही था।

अभिजीत को पता था, मृगांका उसकी बारीक-से-बारीक आदत पर गहरी निगाह रखती थी। कई दफा तो दफ्तर में ही उसे मेसेज करके चेतावनी भी दे देती थी। ...अभि, बाथरूम से निकलने के बाद क्या मॉइश्चेराजर नहीं लगाया पैरों में...देखो अपने पैर, सफेद-सफेद हो रहे हैं।...अभिजीत की नजर तब अपने पैरों पर पड़ती।

अभिजीत ने दादा-परदादाओं ने कभी भी म़ॉइश्चेराइज़र का नाम तक न सुना था। क़स्बाई माहौल से निकले अभिजीत ने हमेशा जाड़ो में सरसों का तेल चुपड़ने के बाद ठंडे पानी से स्नान करना सीखा था। उसके लिए ये सब चोंचले थे। लेकिन, इसी में कई दफा लापरवाही  हो जाती, तो मृगांका तकरीबन डंडा लिए खड़ी होती थी।

...तो अभिजीत बाबू, उगना जो थे, दरअसल वो शिव थे। महाकवि विद्यापति थे बहुत बड़े शिवभक्त। और शिव को भी पता था कि कितने बड़े भक्त हैं। तो भक्त को चाहिए भगवान और भगवान को भी तो आसरा है बस भक्त का ही। भक्त के बिना भगवान अधूरा और अधूरा है भक्त भगवान के बिना।....

अभिजीत को दुनिया में बहुत-सी चीजों के साथ अपनी लिखावट से भी चिढ़ थी। उसकी लिखावट अपने पिता के लच्छेदार अक्षरों और मां की लहरदार लिखावट के बीच कहीं अटकी-हुई सी लगती थी। अभिजीत को अपने पिता जैसा हस्तलेख चाहिए था।

...तो एक दिन क्या हुआ कि भगवान शिव खुद एक हलवाहे लड़के के रूप में विद्यापति के यहां नौकरी-खबासी में आ गए। विद्यापति को कुछ पता ही नहीं। भगवान से ऐसे काम लेने लगे जैसे वो भगवान न हों, कोई सच के खबास हो। खेतों में काम करवाते, निराई-गुड़ाई, भांग पिसवाते-छनवाते, हाथ-पैर दबवाते.....

कहानी कह रहे मुखिया ने उगना को कहानी के बीच में ही हड़काया, ससुर, पैर मालिश करता रह।

मृगांका ने ही अभि का भी ध्यान उन बिंदुओं की तरफ दिलाया था। अनुस्वार की तरफ। जिसे बजाय बिंदी के अभिजीत गोले की तरह लगाया करता और उन की तरफ जिसकी पूंछ अभिजीत तकरीबन लंगूर की पूंछ की तरह कलात्मक तरीके से खींच दिया करता था।

याद आ रहा है उसे एक लंबे दौरे के बाद दिल्ली वापस लौटने के बाद मृगांका से मिलने का। आसपास का माहौल दीवाली की तैयारियों में जुटा था...बिजली की झालरें जगमगाने लगीं थीं। मृगांका उसे देखती रही थी, फिर वो हंसने लगी--हैरानी और खुशी भरी हंसी--जब वो हंस चुकी तो उसने अपना हाथ अभिजीत के हाथों पर रख दिया था।

'मैंने तुम्हें मिस किया," उसने कहा। तुम वापस आए, अच्छा लग रहा है।

अभिजीत उसके चेहरे को गौर से देखता रहा था। बहुत गौर से। मृगांका के बाएं हाथ पर कलाई से थोड़ा ऊपर एक तिल है। लेकिन, काजल लगाने की वजह से मृगांका की आंखे कुछ ज्यादा ही नुकीली थीं। कुछ ज्यादा ही...।

"चलो जाओ, हम बात नहीं करेंगे आपसे ।'' मृगांका अभिजीत के देखने के इस गहरेपन से लजा टाइप गई थी।

अभिजीत अपनी उंगलियां उसकी उंगलियों में फंसा लेना चाहता था, मगर उसने अपना हाथ संयत रखा, मानो थोड़ी सी हरकत सारे जुड़ाव के तार बिखेर न दे।

सप्तपर्णी पेड़ के नीचे बैठकर मृगांका ने अभिजीत के लिए बैक-टू-बैक दो कप चाय मंगाई थी। आज सिगरेट पीने की भी छूट थी। अभिजीत को दो कप चाय एक साथ पीने की आदत थी और यह मृगांका के बहुत खुश होने का सुबूत था कि उसने दो कप चाय अभिजीत के लिए मंगवाई थी।

चाय खत्म होने तक, अंधियारा घिर आया था। सड़क पर गाड़ियों की चहल-पहल अब ट्रैफिक के शोर में बदल गई थी। "चलो, ' उसने अभिजीत को उठाते हुए कहा था, 'जब तुम वहां की बातें करते हो ना, जहां से तुम आए हो, तो मुझे बहुत अच्छा लगता है, तुम्हारा शहर, वहां की मिट्टी...वहां के लोग, तुम्हारा बचपन..." उसने अपनी बांहे अभिजीत की बांहों में पिरोते हुए कहा, "तुम एकदम जी उठते हो।" 

मृगांका ने कार का दरवाजा खोला था और तकरीबन अभिजीत के कंधे पर सिर टिकाते हुए ही गाड़ी स्टार्ट की थी। अभिजीत पेशोपेश में था कि मृगांका की हिदायतों के बावजूद उसने अपने फ्लैट का जो कचरा किया हुआ था, उसे देखकर मृगांका उसे उधेड़ देनेवाली थी।

...तो ऐसा हुआ अभिजीत बाबू, भक्त भगवान के यहां नौकरी कर रहे। एक दिन विद्यापति महोदय को जाना पड़ा राज दरबार...बाईस कोस का रास्ता...उगना साथ में खबास। रास्ते में लग गई विद्यापति को प्यास...न खाना न पानी...करें तो करें क्या, रे उगना देख पानी कहां...मारे प्यास के गला सूख जाता है। विद्यापति कवि जहां ठौर पाया बैठ गए.....

अभिजीत को फ्लैट पर जाने से पहले अपने कलेजे की धड़कन साफ-साफ सुनाई दे रही थी। धक्-धक्।

कमरे में जाकर मृगांका ने  न किताबों की ढेर पर नजर डाला, न बिखरे अखबारों पर।  अभि, एक गिलास पानी देना जरा...

सुनो अभि। मृगांका ने उसे अपने पास बुलाया। अभिजीत पास गया। मृगांका ने आंखों में आंखे डालकर कहा, पता है तुम्हारी गरदन पर एक गहरा तिल है।....अभिजीत का हाथ अपने तिल पर चला गया....मृगांका ने पलक झपकाए बिना कहा, मैं इसे किस करना चाहती हूं.....अभिजीत के मन में एक साथ कई भाव आए। उसने अपने हाथों में मृगांका को समेट लिया।

मृगांका ने अपने होंठ अभिजीत की गरदन पर रख दिए। होंठ जैसे जलते अंगारे।

... धूप क्या थी जलता अँगारा ता अभिजीत बाबू, विद्यापति तो धम्म से बैठ गए। पता नहीं, उगना कहां से एक लोटा पानी ले आया था। ठंडा, शीतल, निर्मल.....

ठंडा, शीतल, निर्मल....जलते अंगारों से होंठो की छुअन ने अभिजीत के मन में आग लगाने की बजाय कुछ ऐसे ही भाव पैदा किए थे। लेकिन इन भावों के पीछे एक ज्वार-भाटा भी था। मृगांका ने बिस्तर पर लेटकर आंखें बंदकर लीं, अपनी कोहनियों के सहारे लेट गई, भरोसे से भरी नन्हीं बच्ची जैसी...।

लेकिन अभिजीत का ब्लैडर फटने के करीब आ चुका था। टॉयलेट की तरफ दौड़ने से पहले उसने मृग से कहा था, मृग एक मिनट...और जब तक यूरिनल से निबटकर वह आया था...वो गहरी नींद सो चुकी थी।

मृगांका...अभिजीत ने पुकारा। कोई जवाब नहीं। अभिजीत को समझ में नहीं आया कि आखिर वह करे तो क्या करे। आखिरकार, लाइट बंद करने से पहले वह थोड़ा हिचकिचाया भी...। पर्दे खुले थे, सड़क की रौशनी अंदर आ रही थी और उसी रौशनी में अभिजीत मृगांका के सीने के उतार-चढाव देखता रहा।

फिर, अभि ने उसे एक चादर ओढ़ा दी और अपने लिए फर्श पर एक तकिया उछाल लिया।  अभिजीत थका तो था, लेकिन नामालूम वजहों से ख्वाबों में डूबने के लिए उसे एक लंबा इंतजार करना पड़ा। सुबह वह तब भी नहीं जगा था, जो उसे बाद में मालूम हुआ कि , मृगांका ने जाने से पहले अभिजीत के माथे को चूम लिया था।

अभिजीत जब जगा तो पड़ोसी के यहां कबीर का निरगुन तेज आवाज में बज रहा था...

हमन है इश्क़ मस्ताना, हमन को होशियारी क्या....

जो बिछुड़े हैं पियारे से, भटकते दर-ब-दर फिरते,
हमारा यार है हम में हमन को इंतजारी क्या ?

न पल बिछुड़े पिया हमसे न हम बिछड़े पियारे से,
उन्हीं से नेह लागी है, हमन को बेकरारी क्या ?


....जारी

2 comments:

eha said...

बेहतरीन.....

सुनीता said...

सुनो मृगांका ............................ कहानी नहीं हकीकत है ,

लेखक ने इतनी खूबसूरती से वर्णन किया है जोकि काबिल -ए -तारीफ़ है