Friday, October 5, 2007

आस्थाओं के प्रति अनास्था का दौर..

यह आस्थाओं के प्रति अनास्था का दौर है। कम से कम मेरे व्यक्तिगत अनुभव यही कहते हैं। राम का सेतु था, या नहीं था। राम थे या नहीं थे? सवाल बड़े हैं, जवाब गोलमोल। मेरा मानना है कि हम वैचारिक अराजकता के दौर में हैं। राम हैं या नहीं है.. मेरे छोटे से दिमाग़ में नहीं आता। लेकिन मेरी विधवा मां अब भी जब राम मंदिर या उससे पहले भी जब मंदिर-कमंडल का मुद्दा सामने था ही नहीं तब भी कुछ घट-अघट होने पर राम के सामने ही रोती थी। मूर्ति के सामने । इस्लाम इसे कुफ्र क़रार देगा। यह उनकी आस्था है कि मूर्तिपूजा काफिरों का काम है। आपकी आस्था ( जो राम को मानते हैं उनके लिए) राम में है, मूर्तिपूजा में है।

हिंदू संस्कृति में कोई एक धर्म नहीं है। लोग शैव हैं, वैष्णव हैं, शाक्त है, लेकिन हिंदू हैं या नहीं इसके लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाना पड़ता है। हम मानते हैं कि कुछ ऐसी बाते हैं, जो दकियानूसी कठघरे मे आती हैं, उनसे छुटकारा पाना ही ठीक है। लेकिन उस के बराबर ही यह मानना ही होगा कि आस्था या विश्वास को हथौड़े से नहीं तोड़ा जा सकता। गणेश की पत्थर की मू्र्तियां दूध पी सकती हैं। पत्थर के हनुमान के आंसू निकल सकते हैं। पटना में पत्थर पानी पर तैर सकता है। साइंस कहता है कि पत्थर पानी पर तैर सकता है। कुछ पत्थरों में अंदर ज्वालामुखी की गैस भरी होता है, जिससे वह पानी पर तैर सकते हैं। लेकिन छद्म सेकुलर लोगों के लिए कोई साइंस सत्य नहीं। सत्य तो केवल वोट है, वही शाश्वत है, चिरंतर है।

क्या वजह हो सकती है कि राम सेतु मुद्दे को बीजेपी हवा दे रही है। देश भर में बंद करवा रही है। उसी के बराबर करुणानिधि अपनी गोटी फिट करने में लेगे हैं, क्यों कि द्क्षिण में उनकी गोटी ही राम विरोध पर चलती है। फिट होती आई है। राम के नाम पर हलफनामा देने वाली सरकार को दिखा ही नहीं कि कुछ साल पहले उनके ही एक बेहद लोकप्रिय नेता ने राम लला के मंदिर के ताले खुलवाए थे। उनके ही के मौनी बाबा ने भ्रष्टाचार के आरोप पर कहा था कि इस अग्निपरीक्षा से मैं सीता मैया की तरह निकल आऊंगा। राम ही नहीं तो काहे की सीता मैया गुरु?तो घट-घट में बसने वाले राम पर टीका -टिप्पणी का दौर जारी है। राम अगर कहीं होंगे, तो जन्म स्थान (माफ कीजिएगा, राम ते ही नहीं तो जन्म किसका और कौन सा जन्म स्थल?) फिर भी अगर कहीं हों, तो हंस रहे होंगे कि देखो बेट्टा, मेरे नाम पर कैसे पब्लिक को चू..तिया बना रहे हो। चलिए राम की तो खैर मनाइए..ऐतिहासिक सुबूत मांगे जाएंगे, तो क्या पेश करेंगे आप। लेकिन गांधी का क्या। उनके अपनों ने ही उनको पराया कर दिया है। गांधी आज संजय दत्त की गांधीगीरी के मुहताज हो गए हैं। राजघाट पर आने वाले लड़के, लड़के नहीं लफाडिए होते हैं। लड़कियां ब्यायप्रेंड से मिलने आती है। (सारी नहीं,, लेकिन ज्यादातर)। गांधी स्मृति संग्रहालय में आए बच्चे टीचर को कोस रहे थे, कहां फंसा दिया। अच्छा होता कि किसी पीवीआर में जाकर हे बेबी में उघड़े हुए बदन वाली लड़कियां टापता।
हम अराजक हो रहे हैं। अपनी संस्कृति के तौर पर भी, और अपीन आस्थाओं के लिहाज से भी। प्रचलित परंपराओं का विरोध करना ही ठीक नहीं है। पहले यह जांच लेना ठीक होगा कि उनमें से कुछ परंपराएं हमारी आस्था भी हो सकती है। सच हो न हो, उनका अतीत में कोई अस्तित्व रहा हो., न रहा हो।

मुझे यह कहने में कोई गुरेज नहीं कई बंधु तो सिर्फ सेकुलर दिखने, या वैचारिक लड़ाई में हाथ ऊपर रखने के लिए राम का विरोध कर रहे हैं। ठीक वैसे ही जैसे चंदा देते वक्त लोग मार्क्सवादी और प्रसाद-भोग लेते वक्त आस्तिक हो जाते हैं। धिक्कार है।

3 comments:

विनीत कुमार said...

भाई गुस्ताख आज पूरा ब्लॉग घूमा। आओ कभी हमारे ब्लॉग गाहे-बगाहे पर

sushant jha said...

भाई, क्या खडी-खडी बातें लिखी है। वाकई तबीयत फडक उठी। ये चिन्ता की बात है कि हिन्दुओं का तालिबानीकरण शुरु हो गया है-ओर इन सेकुलरों ने हिन्दू आस्थाओं को गाली देकर इस चीज को और उकसाया है।

wanderlust said...

The comments were Manjit like...thinking...deducting...analysing..what was missing was the razer's edge for which you were famous at IIMC...remember your editorial for the institute magazine...i'm sure our wait for that kinda piece would be well deserved....