Monday, April 7, 2008

बीकानेरी भुजिया का स्वाद


बीकानेर कहते ही मन में भुजिया कौंद जाता है। मेरे मुंह में पानी आ जाता है. तो आपने भी ज़रूर चखा होगा। बीकानेर और इसके आसपास के इलाकों में भुजिया और पापड़ तैयार करने की साढे चार सौ से भी ज्यादा छोटी-बड़ी इकाईयां काम कर रही है।

मैंने अपने बीकानेर दौरे में उन कारखानों का भी रुख किया। सोचा आमने-सामने देखते हैं कि स्वादिष्ट भुजिए को बनाने की तरकीब क्या है।

बीकानेरी भुजियों की कई किस्में होती हैं। लेकिन इसे बनाने में बहुत सावधानी बरती जाती है। शिवदीप इंडस्ट्रीज के कारखाने में हमने देखा कि कारखाने के अंदर इलाके में ही पैदा होने वाली मोठ की दाल से बेसन तैयार किया जाता है।

इस बेसन में तेल और एक मसालों का मिश्रण तैयार किया जाता है। इस मिश्रण का राज़ बेहद गुप्त रखा जाता है। कर्मचारियों तक को मसाले बनाने का रहस्य पता नहीं। फिर गूंथे गए बेसन के मिश्रण से तैयार होता है भुजिया।

कारखाने के अंदर ही कड़कते तेल में छन-छन छनते भुजिया की खुशबू से नाक भर गया।

इसी कारखाने में लजीज़ मीठे और नरम-नरम बीकानेरी रसगुल्ले भी तैयार होते हैं। अठारहवीं सही के आखिर में कोलकाता में खोजे गए रसगुल्लों का फॉर्मूला अपने शुरुआती दौर में ही बीकानेर तक आ गया और फिर बीकानेरी रसगुल्लों ने अपनी अलग पहचान बना ली, लोगों की ज़बान पर चढ़कर। कोलकाता के रसगुल्लों से बीकानेर के रसगुल्लों में एक अंतर होता है, वह है मिठास का अंतर।

बीकानेर प्रवास के दौरान मैंने खूब छककर रसगुल्ले उडाए। हमारी टीम के लोगों ने ५-५ किलों रसगुल्ले वापसी के वक्त बंधवा लिए अपने परिवार के लिए। मैंने अपनी ब्राह्मण वृत्ति के ही अनुसार खाने के काम में अपरिग्रह का परिचय दिया, साथ ही माना कि कल पर कोई काम नहीं छोड़ा जाना चाहिए, और रौज़ाना के हिसाब से बड़ी मात्रा में रसगुल्ले उदरस्थ किए। वैसे मजा़ आ गया।

अगले दिन लिखूंगा, हमारे डॉक्यूमेंट्री शूट करने का अनुभव। लाडेरा गांव जाने का तज़रबा और एक स्थानीय शख्स के यहां बाजरे की रोटी उडा़ने का नायाब मौका कैसे मिला यह भी।

3 comments:

Udan Tashtari said...

रोचक जानकारी मेरी पसंदीदा बीकानेरी भुजिया की-स्वाद आ गया. :)

राजीव जैन Rajeev Jain said...

शुक्रिया आपका
यूं राजस्‍थान घुमाने का

सागर नाहर said...

बीकानेरी भुजिया के तो अपन भी दीवाने हैं, पकिट खोलने के बाद जब तक खत्म नहीं कर लेते तब तक चैन नहीं पड़ता।
बीकानेर के रसगुल्ले में एक फर्क और भी है, यहां के रसगुल्ले स्पंज की तरह होते हैं, दबाने से सारा रस बाहर .. जब कि जोधपुर के पास लूणी, जहाँ के रसगुल्ले बहुत मशहूर है; के रसगुल्ले स्पंज की तरह नहीं होते। ये बीकानेर के रसगुल्लों से भी ज्यादा स्वादिष्ट होते हैं और उतने मीठे भी नहीं कि ज्यादा मात्रा में खाये ना जा सकें।
आपकी ब्राह्मण वृति के बारे में जान कर हंसी आ गई। :)