Saturday, November 24, 2007

फिल्म ४ मंथ्स...- पुनर्मूल्यांकन

कल ओपनिंग सेरेमनी में रोमानिया की पूरी फिल्म देखने को मिली। फिल्म की शुरुआत होती है एक लड़की की भागदौड़ से। लड़की अपनी दोस्त के लिए एक होटल का कमरा खोज रही होती है। इसी दौरान कॉलेज जाकर अपने पुरुष मित्र से मिलना.. उसकी मां के जन्मदिन पर जाकर फूल भंट करने का वादा भी करती है। यूं तो पूरी फिल्म में है , लेकिन शुरुआत के तीन सीन, सीन न रहकर सीक्वेंस बन जाते है। मौंगू (निर्देशक) का कैमरा पहले सीन में ४ मिनट और उसके अगले दृश्य में ७ मिनट तक कट नहीं होता। फिर के बाद एक कई ऐसे दृश्य आते हैं, जहां यह लगता है कि हम रियलिटी में हों। वर्चु्अलिटी का खात्मा हो जाता है। बहरहाल, लड़की जद्दोजहद करके एक होटल का कमरा खोज निकालती है।

कम्युनिस्ट शासन.. कड़ाई के दिन.. दर्शकों को लगता है कि लड़की अपने और अपने दोस्त के लिए एकांत की तलाश में हैं.. यह धारणा पुष्ट होती है तब जब वह किसी मि. बेबे को लेकर उस कमरे तक आती है। बातो ही बातों में पता चलता है कि बेबे महोदय चोरी-छिपे गर्भपात को अंजाम देते हैं। वह लड़ीक से जितनी रकम की मांग करते हैं, वह न तो उसके पास होता न ही उसकी सहेली के पास। याद रखना ज़रूरी है कि लड़की की सहेली गर्भवती है, लड़की नहीं। फिर पता यह चलता है कि लड़की को ५ माह का गर्भ है, जिसेक गर्भपात पर १०साल की कैद हो सकती है। यानी हत्या का मुदमा। डॉक्टर साबहब लड़की को कहते हैं कि वह यह काम महज कुछ हज़ार रुपयो के लिए नहीं करते बल्कि वह तो कुछ और मांग करते हैं। लड़की डॉक्टर के साथ हमबिस्तर होती है।.

..... कहानी पूरी तरह बताना मेरे बस में नहीं... फिर खेल शुरु होता है कि किस तरह पेट में पल रहे बिना जन्मे बच्चे को क्रूरता से वह डॉक्टर मार डालता है।फिल्म के आखिर में पता चलता है कि अपनी सहेली की सहायता के के लिए डॉक्टर के साथ हमबिस्तर होने वाली लड़की खुद गर्भवती हो गई है. उसके पेट में उसी डॉक्टर का गर्भ पल रहा होता है। फिल्म आपोक सन्नाटे में छोड़ देती है। कुछ महसूस करने के लिए.... रोमानिया में गर्भपात पर से कानूनी अड़चन हटने के बाद किस तरह से गर्भपातों के मामले बढ़ गए , इसका जिक्र हम पहले ही कर चुके हैं. २ साल में १० लाख गर्भपात...

४ मंथ्स... का कैमरा शानदार है, उससे भी शानदार है निर्देशन क्रिस्टीन मोंगू का। गर्भपात वाले दृश्य में एक पल के लिए तो कलेजा मुंह को आने लग जाता है। हालांकि हमने जहां देखा वह हॉल साउंड के लिहाज से उत्तम नहीं कहा जा सकता ..लेकिन तब भी जितना हम महसूस कर सकते थे, सिनेमैटोग्राफी और साउंड ने..गीले-गीले वातावरण बारिश और बरफीले माहौल ने कहानी के मौतनुमा वातावरण को सिरजने में मदद ही दी है।

बहरहाल, मनीष झा की फिल्म मातृभूमि की चर्चा किए बगैर मैं नही रह सकता..कहना होगा कि मातृभूमि एक तरह से इस फिल्म का तीसरा अध्याय है। दूसरा अध्याय कोई और बनाएगा. जो अभी अधूरा रह रहा है।

मंजीत ठाकुर

2 comments:

बाल किशन said...

रोमानिया की एक कहानी (सच्ची या फिल्मी ) से परिचय करवाने के लिए धन्यवाद.

sushant jha said...

बाप रे..इतनी निर्दयता...पढ कर रोंगटे खडे हो गये..। हमारे यहां ऐसी फिल्में कब बनेंगी..