Sunday, November 25, 2007

खुदा के लिए- लाजवाब

यह न माना जाए कि कहानी आतंकवाद को ध्यान में रककर बुनी गई है, इसलिए पसंद की जाएगी। फिल्म का संगीत पक्ष बेहद मज़बूत है। लेकिन बात पहले कुछ और.. पूरी फिल्म ऐसी है कि यह न तो इस्लाम के खिलाफ जाती है, न आतंकवाद के खिलाफ लड़ने का दम भरने वाले पश्चिमी देशों के हक़ में। यह सिर्फ कट्टरपंथ के खिलाफ है और है इस्लाम की ग़लत व्याख्या करने वाले कठमुल्लाओं के खिलाफ़। कैसे भोले नौजवानों को अपने हक़ में कठमुल्ला इस्तेमाल करते हैं उसकी बेहतरीन मिसाल पेश करती है ये फिल्म। साथ अमेरिकी तंज़ नज़र को भी उघाड़कर नंगा करती है. (इसे निर्देशक की किसी को तुष्ट करने की कोशिश न माना जाए, तो बेहतर)

बहरहाल, औरत के हुकूक, इस्लाम की व्याख्या और जिहाद के लिए नशीली चीज़ो के व्यापार भी करने वाले लोगों की चर्चा करती फिल्म कई बार आपको सोचने के लिए मजबूर भी करेगी। खास कर शिकागो के एक दृश्य में जहां मंसूर संगीत की शिक्षा के लिए जाता है, उसे गाने के लिए कहा जाता है। वहीं परिचय के दौरान एक लड़की उसेस उसके मुल्क का नाम पूछती है..और वह पाकिस्तान को नहीं जान रही होतीहै। विदेशों में आम लोगों के मन में अब भी पाकिस्तान भारत का पडो़सी देश ही है। ताजमहल वाले देश का पड़ोसी...।

खैर.. लड़का जब गाना शुरु करता है तो वह गीत होता है...नीर भरन जाऊं कैसे... भारतीय गीत...। लेकिन उसेके आलाप के साथ दूसरे देशों के संगीतकार भी अपेन वाद्य बजाने लग जाते हैं..और निर्देशक का यह अपना तरीका है यह कहने का कि दुनिया की सबी संस्कृतियां मूल रूप में एक ही चीज़ सिखाती हैं.. भाईचारा।फिल्म में एकाध जगहों को छोड़कर तकनीक भी सही है। खासकर इस साउंड बेचैन कर देता है कभी-कभी। खासकर, कट्टरपंथी मुल्ला के लहू गरमाने वाली तकरीर के दौरान ध्वनि में एक खास कंपन है जो निश्यच ही बेचैन करने वाली है।

नसीरूद्दीन शाह फिल्म में उदारवादी मौलवी की भूमिका में हैं, जो बताते हैं कि संगीत इस्लाम में नाजायज़ नहीं। कुल मिलाकर रोहिल हयात का संगीत फिल्म के प्रभाव में खास योगदान देता है। अदालत में हुई पूरी तकरीर के बाद सरमद अपीन ग़लती मान लेता है, लेकिन अदालत में ही कट्टरपंथी उसकी खूब पिटाई करते हैं।

बहरहाल, मंसूर अमेरिकी प्रशासन की आतंकवादी विरोधी गतिविधियों के नतीजतन लकवाग्रस्त और पागल होकर वापस लौटता है... लेकिन इसके बाद फिल्म में जो होता है..वह वास्तविक लगने की बजाय जनहित मे जारी सरकारी एड की तरह लगने लगता है। मेरी लंदन वापस जाने की बजाय वजीरिस्तान जाकर बच्चों को पढ़ाने लग जाती है.। इस कहानी का इतना सुखद अंत पचता नहीं है... मंसूर के हिस्से आया क्लाईमेक्स ज़्यादा अपील करता है। बहरहाल, फिल्म बेहद शानदार है।

इसे न देख पाए, और अच्छी फिल्में देखने के शौकीन हैं, तो ज़रूर कुछ मिस करेंगे। पूरे भारतीय उपमहाद्वीप के लिए प्रासंगिक है। फिल्म समारोह से एकाध पुरस्कार बटोर ले जाए तो मुझे हैरत नहीं होगी।

मंजीत ठाकुर

2 comments:

बाल किशन said...

जानकारी के लिए धन्यवाद. जरुर देखेंगे जी.

sushant jha said...

Thanks Manjit for putting up so many useful informations...will sure try to watch this movie..hope some more analysis from u....